आज कल मीडिया व् सोशल मीडिया पर विरोधी दल इसका बड़ा शोर मचा रहे हैं , की मोदी सरकार सरकारी कंपनीओं को बेच रही है ,
इस शोर मैं अक्सर वे बताना भूल जाते हैं की 2004 से 2014 तक की कांग्रेस ,वाम दलों व अन्य की सरकार ने लगभग ढेड़ लाख करोड़ की सरकार की हिस्सेदारी बेचीं थी।
2014 में हममें से कई लोग प्रधान मंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के उत्थान के बारे में काफी आशावादी थे और उम्मीद कर रहे थे कि कुछ आर्थिक बदलाव होंगे। हां, कुछ काम हुआ – जैसे बैंकों ने रुइया जैसे लोगों से बड़ी रकम वसूल की, जो यह ऑन रिकॉर्ड कहते थे कि “मैं कर्ज नहीं चुकाऊंगा”। यह पहली बार था जब हमने उद्योगपतियों को बैंक ऋण चुकाने के लिए अपनी संपत्तियों की बिक्री करते देखा गया । अनिल अम्बानी समूह को “बीएसईएस” अदानी को बेचने की कल्पना करना पहले असंभव था ! ऐसा ही कुछ मित्तल के साथ हुआ और वे एस्सार स्टील की संपत्ति के लिए बोली लगाते दिखाई दिए !
हालांकि, सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण नहीं हो रहा है ,हाल फ़िलहाल तो बिलकुल नहीं , और इसके कई कारण हैं
पहला :- क्योंकि सरकार सरकारी कंपनीओं को उन परिसंपत्तियों को खरीदने के लिए मजबूर करती है जो सरकार अपने पैसे से खरीदना नहीं करना चाहती है इसलिए उनका निजीकरण सरकार के लिए असुविधाजनक रहेगा।
उदाहरण :- एशियाड खेलों के लिए बनाए गए दिल्ली के एथलीट विलेज को सरकारी तेल कंपनी को ऊंची कीमतों पर बेचा दिया गया और उन्हें इस कंपनी का “गेस्ट हाउस” कहा गया।
दूसरा- अभी कुछ समय पहले सरकार अवं पेट्रोलियम मंत्रालय तेल कंपनियों को 30 अतिरिक्त लोगों को काम पर रखने के लिए कहता है, जिन्हें वास्तव में इन तेल कंपनीओं से वेतन मिलता है, लेकिन वे लोग काम सरकार के लिए करते हैं।ऐसे भी इन कंपनियों का उपयोग किया जाता है
तीसरा –अंडर सेक्रेटरी स्तर के अधिकारिओं को तन्खा के अलावा कार , ड्राइवरों, गेस्ट हाउस के उपयोग के लिए पूरी छूट रहती है ।
चौथा – मोटी आमदनी , तथा जवाबदेही अवं प्रतिस्पर्धा का आभाव , कर्मचारीओं को राजनैतिक सक्रियता तथा यूनियन आदि के लिए सुलभ माहौल देता है ,जिसे वे किसी कीमत पर छोड़ नहीं सकते।
भारतीय व्यवस्था ऐसी ही है ,इसकी ये चीजें नहीं बदली हैं, और न ही यह बदलेगी। मंत्री और बाबू इन कंपनीओं का निजीकरण कभी नहीं होने देंगे। नरेंद्र मोदी भले ही “कम सरकार और अधिक शासन” के मॉडल को लाने के इक्षुक हों पर पिछले सत्तर सालों मैं पत्थर की तरह दृढ़ हो चुकी व्यवस्था को बदलने का काम असंभव जैसा है।
अब पीएसयू बैंकों को ही लें। बैंकिंग के इतिहास मैं 92 प्रतिशत घोटाले सरकारी बैंकों मैं हुए हैं और मात्र आठ प्रतिशत निजी बैंकों मैं , पर जनता को इसकी परवाह नहीं दिखती । अभी कुछ समय पहले बाबू और बैंकों में वरिष्ठ अधिकारियों ने नोटबंदी के दौरान बहुत पैसा कमाया (और सारा दोष नरेंद्र मोदी के ऊपर आया) ।
वैसे वैश्विक निवेशक इस सच्चाई को अच्छी तरह जनता है इसीलिए हम पाते हैं की स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया जो की भारत का सबसे बड़ा बैंक है उसकी मार्किट वैल्यू लगभग । 4.5 लाख करोड़ पायी गयी है ,वही उसकी तुलना मैं एक निजी बैंक HDFC की मार्किट वैल्यू 8.5 लाख करोड़ है।


