कप्तान गया, खेल बाकी

इमरान खान सत्ता में आए तो थे ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का वादा करके, पर देश को रसातल में धकेल दिया। पाकिस्तान को इस्लामी देश बनाने की इच्छा भी धरी रह गई। फौज चाहती तो इमरान सरकार की विदाई पहले ही हो जाती। लेकिन फौज से उन्हें मोहलत मिलती रही।

इमरान खान सत्ता में आए तो थे ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का वादा करके, पर देश को रसातल में धकेल दिया। पाकिस्तान को इस्लामी देश बनाने की इच्छा भी धरी रह गई। फौज चाहती तो इमरान सरकार की विदाई पहले ही हो जाती। लेकिन फौज से उन्हें मोहलत मिलती रही। आखिर में फौज ने आक्सीजन सपोर्ट हटाया, इधर एक-एक कर सहयोगी हाथ खींचते गए और इमरान सरकार की इतिश्री। अब देखना यह है कि विपक्ष की आगे की रणनीति क्या है और फौज क्या करेगी

 जिस समय आप यह अंक पढ़ रहे होंगे, पाकिस्तान में इमरान सरकार गिर चुकी होगी। जैसा कि हम लगातार बता रहे थे कि मार्च का महीना इस सरकार पर भारी है और वह इस महीने को पार नहीं कर पाएगी। तकनीकी रूप से 30 मार्च को एमक्यूएम के सहयोगी दल के तौर पर अलग होने के साथ ही सरकार अल्पमत में आ चुकी है। 3 या 4 अप्रैल को विश्वासमत पर मतदान के साथ ही औपचारिक रूप से सरकार गिर जाएगी।

पिछले दो से तीन हफ्ते पाकिस्तान की राजनीति में घटनाक्रम का चक्र बहुत तेजी से घूमता रहा। सेना की ओर से मार्च के दूसरे सप्ताह में प्रधानमंत्री इमरान खान को संदेश दे दिया गया था कि सरकार के सहयोगियों के अलग होने की खबरों के बीच उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। इमरान खान लगभग अक्तूबर से ही किसी न किसी बहाने अपनी सरकार के कार्यकाल को थोड़ा-थोड़ा कर आगे बढ़ा रहे थे। कभी स्टेट बैंक आॅफ पाकिस्तान के बिल को लेकर तो कभी किसी और बहाने। मार्च में एक बार फिर सेना की ओर से इस्तीफा देने की सलाह के बाद इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन की आड़ में फिर बढ़ोतरी मांगी गई। यहां यह उल्लेखनीय है कि सहयोगी दलों ने इस समय तक औपचारिक रूप से समर्थन वापस नहीं लिया था। लेकिन यह दिखाई दे रहा था कि प्रधानमंत्री लगातार संसदीय दल की बैठक को टाल रहे हैं। बैठक बुलाई जाती तो इससे यह स्पष्ट हो जाता कि सरकार अल्पमत में आ चुकी है। इसी कारण इमरान सरकार लगातार अपनी राजनैतिक समिति की बैठक तो रोज बुला रही थी, लेकिन संसदीय दल की बैठक नहीं। आशा की जा रही थी कि जैसे ही इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन समाप्त होगा तो प्रधानमंत्री इस्तीफा दे देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। आदतन प्रधानमंत्री ने फिर सेना से 6 माह की मोहलत इस वादे के साथ मांगी कि चुनाव करा दिए जाएंगे। इस बार सेना ने इस पर सहमति नहीं दी। यह समझा जा चुका था कि आने वाले 6 महीनों में भी कोई परिवर्तन आने वाला नहीं है। ऐसी परिस्थिति में 6 माह बाद जो भी होना है, उसे अभी ही कर लेना सभी को बेहतर नजर आया। यही वह समय था, जब सहयोगी दलों को सक्रिय होने के लिए कहा गया और एक-एक कर उनकी ओर से अलग होने के संकेत आने लगे। सहयोगी दलों के सरकार से हटने के बाद इमरान सरकार के पास करीब 140 सांसद रह गए, जबकि बहुमत के लिए सरकार को 172 संसद सदस्यों की आवश्यकता है।

पहली चोट इलाही ने दी
इस क्रम में पहली चोट पंजाब के परवेज इलाही ने दी। उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार मेहर बुखारी से एक साक्षात्कार में कहा कि इमरान खान को सरकार चलाना आया ही नहीं। जो लोग उन्हें सत्ता में लेकर आए थे, वही अब तक उनकी सरकार को चलाने का प्रयास कर रहे हैं और दिशानिर्देश दे रहे हैं। यह बताने के क्रम में उन्होंने इमरान की तुलना उस बच्चे से की, जिसके अंत:वस्त्र मां-बाप बदलते हैं ताकि उनमें से बदबू न आए। मेहर के यह पूछने पर कि अब यह अंत:वस्त्र बदलने से इनकार क्यों किया जा रहा है, इलाही का जवाब रुचिकर था। उन्होंने कहा, ‘‘लगता है अब अंत:वस्त्र महंगे हो गए हैं।’’ इसके बाद आसिफ अली जरदारी के घर पर इलाही रात्रिभोज के लिए मिले और समझौते पर सहमति बन गई। दोनों ने मिलकर दुआ-ए-खैर पढ़ी। इसका मतलब था कि दोनों ने अपनी रणनीति तय कर ली थी और अल्लाह से उसकी सफलता की कामना की। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।

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