ऐसे अनेक साक्ष्य हैं, जो बताते हैं कि कुतुब मीनार ‘ध्रुव स्तंभ’ थी और उसके परिसर में मौजूद ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’ को 27 हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से बनाया गया था।
ऐसे अनेक साक्ष्य हैं, जो बताते हैं कि कुतुब मीनार ‘ध्रुव स्तंभ’ थी और उसके परिसर में मौजूद ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’ को 27 हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से बनाया गया था।
इतिहास गवाह है कि दुनिया में इस्लाम का प्रसार तलवार के बल पर हुआ। इस्लामी लुटेरे जहां भी गए, वहां उन्होेंने लोगों को मारा-काटा और इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया। यही नहीं, लोगों के मनोबल और स्वाभिमान को गिराने के लिए उनके पूजा-स्थलों को ध्वस्त किया और उनके मलबे से मस्जिदों का निर्माण किया। इस्लामी लुटेरों ने भारत मेें भी यही किया। अभी भी भारत में सैकड़ों ऐसी मस्जिदें हैं, जिनकी दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं के चित्र या सनातन धर्म के अन्य प्रतीक चिह्न दिखाई देते हैं।इन दिनों ऐसी ही एक मस्जिद की चर्चा गर्म है। यह मस्जिद है ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’, जो नई दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में है। ‘कुव्वतुल इस्लाम’ का अर्थ है-इस्लाम की ताकत। यानी इस मस्जिद को बनाने का मकसद था हिंदुओं को इस्लाम की ताकत का अहसास कराना। कई देशी और विदेशी इतिहासकारों ने लिखा है कि इस मस्जिद का निर्माण 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। यही नहीं, भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) ने भी वहां पर जो सूचना पट लगाया है, उस पर लिखा है कि यह मस्जिद 27 मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थी। फिलहाल यह मस्जिद एएसआई की देखरेख में है। इसमें किसी को नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है।अनेक पुस्तकों में मिले साक्ष्यों के आधार पर लगभग सवा साल पहले नई दिल्ली के साकेत स्थित सत्र न्यायालय में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें मांग की गई है कि इस मस्जिद में हिंदुओं को पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। यह याचिका तीन लोगों ने दाखिल की है। इनमें से दो हरिशंकर जैन और रंजना अग्निहोत्री अधिवक्ता हैं। तीसरे हैं सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह ‘बिशेन’। हरिशंकर जैन ने अपने को तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव का वाद मित्र और रंजना अग्निहोत्री ने भगवान श्रीविष्णु का वाद मित्र माना है। वहीं जितेंद्र सिंह ‘बिशेन’ एक भक्त के नाते इस याचिका में शामिल हैं।
याचिका में अदालत से मुख्य रूप से यह प्रार्थना की गई है कि यह उद्घोषित किया जाए कि पुरातत्व विभाग (नोटिफिकेशन नंबर डीएल 387, 16.01.1914) द्वारा दर्शाई गई जगह पर तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और भगवान विष्णु को भगवान गणेश, भगवान शिव, मां गौरी, सूर्य देवता, हनुमान जी के साथ 27 मंदिरों को पुन: प्रतिष्ठापित कराने का अधिकार है, जिसमें कि पूजा-दर्शन सारे अनुष्ठानों के साथ संपन्न की जा सके।यह भी मांग की गई है कि भारत सरकार को एक न्यास स्थापित करने के लिए कहा जाए और उस न्यास को कुतुब परिसर में स्थित मंदिर परिसर के रखरखाव का अधिकार दिया जाए। यह भी कहा गया है कि जो भी न्यास बने, उसे 27 हिंदू जैन मंदिरों और ‘ध्रुव स्तंभ’ की देखरेख और प्रशासन का अधिकार दिया जाए। एएसआई एक्ट 1958 की धारा 16 और 19 के तहत पूजा करने का अधिकार भी मांगा गया है।याचिका में वर्तमान परिसर को तोड़ने की बात नहीं कही गई है, बल्कि यह कहा गया है कि जो ढांचा खड़ा है, जिसमें कि पहले पूजा-पाठ होता था, वहां एएसआई के अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत धार्मिक अधिकार बहाल किया जाए। इस अधिनियम में यह स्पष्ट प्रावधान है कि पुरातत्व विभाग द्वारा कब्जे में ली गई संपत्ति में धार्मिक कार्य हो सकते हैं तथा आवश्यक निर्माण कार्य भी भवन को बिना क्षति पहुंचाए किया जा सकता है।याचिका के अनुसार दिल्ली का मूल नाम इंद्रप्रस्थ है। इसमें मिहिरावली, जिसे अब महरौली कहते हैं, एक मुख्य शहर था। इस स्थान का नामकरण गणितज्ञ वराहमिहिर के नाम पर हुआ है, जो चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के मंत्रिमंडल के मुख्य पदाधिकारी थे।
इस स्थान पर गणित और ज्योतिषीय ज्ञान व गणना के लिए नक्षत्रशाला का निर्माण किया गया था, जिसे ‘मेरु स्तंभ’ या ‘ध्रुव स्तंभ’ कहा जाता है। और इसी स्थान के साथ में 27 हिंदू और जैन मंदिरों तथा भगवान विष्णु के मंदिर का निर्माण उन नक्षत्रों के अध्ययन के लिए नक्षत्र देवताओं के साथ हुआ था। यह ‘मेरु स्तंभ’ देवताओं को समर्पित था। जब कुतुबुद्दीन के हाथ में सत्ता आई तब से इस ‘मेरु स्तंभ’ को ‘कुतुब मीनार’ कहा जाने लगा। अरबी में ‘कुतुब’ का मतलब किसी धुरी पर घूमना या संतुलित करने को कहा जाता है और ‘स्तंभ’ को ‘मीनार’ कहा जाता है। इसीलिए ‘कुतुब मीनार’ कहा जाता है। इतिहासकार गुंजन अग्रवाल के अनुसार, ‘‘मेरु स्तंभ पर 12वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुरान की आयतें उत्कीर्ण करवा दीं। उसके बाद से इसे कुतुब मीनार कहा जाने लगा।’’ कुतुब मीनार परिसर में 1,600 वर्ष पुराना लौह स्तंभ है जिसे ‘विष्णु स्तंभ’ या ‘गरुड़ ध्वज’ कहा जाता है।हरिशंकर जैन कहते हैं, ‘‘1192 ई. तक दिल्ली हिंदू राजाओं के द्वारा शासित होती थी। तराइन की दूसरी लड़ाई में मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली। उन्हीं दिनों कुतुबुद्दीन ऐबक, जो मोहम्मद गोरी का सेनापति था, ने श्री विष्णु हरि मंदिर और अन्य 27 जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़कर उन्हीं के मलबे से एक ढांचा खड़ा किया, जिसे ‘कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद’ का नाम दिया गया।’’
27 मंदिर असल में 27 नक्षत्रशालाओं के मंदिर थे। यह जगह बहुत ही महत्वपूर्ण थी और ज्योतिषशास्त्र के शोध का बहुत बड़ा केंद्र था।


