रौद्र नर्मदा को शांत करने शंकराचार्य ने ओंकारेश्वर में की थी नर्मदाष्टक की रचना

‘त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवि नर्मदे’। मन को मां नर्मदा के प्रति आस्था से भर देने वाली ये पंक्ति नर्मदाष्टक की है। आज नर्मदाष्टक की रचना करने वाले आदिगुरू शंकराचार्य की जयंती है। आदि शंकराचार्य ने मां नर्मदा के रौद्र रूप को शांत करने के लिए मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में ही नर्मदाष्टक की रचना की थी। छोटी-सी उम्र में वेदांत, उपनिषद देने वाले केरल के आचार्य शंकर को शंकराचार्य बनाने वाली पवित्र धरा मध्यप्रदेश की है। वे अमरकंटक के रास्ते मध्यप्रदेश पहुंचे थे। ओंकारेश्वर में ही उन्हें आचार्य शंकर से शंकराचार्य बनाने वाले गुरू गोविंदपादाचार्य के दर्शन हुए। 

साक्षात भगवान शंकर के अवतार आदिगुरू शंकराचार्य

अपने देश की सनातन संस्कृति के अविरल प्रवाह की प्रशस्ति के लिए सर्वप्रिय गीत, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा की एक पंक्ति है- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा। यूनान, मिस्र, रोम सभी मिट गए काल के प्रवाह के साथ और हमारी सनातन संस्कृति सृष्टि की रचना के समय से अब तक निरंतर चलती चली आ रही है, क्यों ? कवि ने ये जो कुछ बात का संकेत किया है ये कौन-सी बात है ? यह जिज्ञासा हम सभी के अवचेतन मन में है।मैं समझता हूं कि ये जो कुछ बात है इसके पीछे ही खड़े हैं आदिगुरू शंकराचार्य जी। साक्षात भगवान शंकर के अवतार। गीता में धर्म की हानि होने पर ईश्वर के मनुष्यरूप में अवतार का वर्णन है। त्रेता में राम और द्वापर में कृष्ण का अवतार हुआ। इनके जन्म की पृष्ठभूमि में राक्षसी शक्तियों का अत्याचार, अनाचार, सामाजिक पतन था। धरती में चारों तरफ हाहाकार मचा था। इन दोनों ईश्वरीय अवतारों ने मनुष्य रूप धर जग को मुक्ति दिलाई। ईश्वर अंश होने के बावजूद दोनों ने मनुष्य रूप में जितने कष्ट होते हैं उसको भोगा। किसी चमत्कार से नहीं बल्कि अपने मानवीयोचित पराक्रम से समाज की आदर्श व्यवस्था कायम की।

अलौकिक शंकराचार्य

मनुष्य कामना करता है कि जब उसके प्राण निकले तो मुंह से गोविंद का नाम निकले राम का नाम निकले। गांधी जी हे राम का उच्चारण करते हुए इस लोक से चले गए। राम और कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। मनीषियों ने जगदगुरू शंकराचार्य को साक्षात शंकर का अवतार माना है। आचार्य शंकर की अलौकिकता उनके जन्म संन्यास की दीक्षा से लेकर महाप्रयाण तक प्रकट रूप से रही।

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