टॉम्ब ऑफ सैंड को इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार, ये अवॉर्ड जीतने वाली पहली हिंदी किताब

दिल्ली।  भारतीय लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास टॉम्ब ऑफ सैंड को इंटरनेशनल बुकर प्राइज से नवाजा गया है। इसे अमेरिकन ट्रांस्लेटर डेजी रॉकवेल ने इंग्लिश में ट्रांसलेट किया है। ये दुनिया की उन 13 पुस्तकों में शामिल थी, जिसे  इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार की लिस्ट में इंक्लूड किया गया था। 

पहली बार हिंदी उपन्यास को बुकर पुरस्कार

आपको ये जानकर बेहद खुशी होगी की ‘टॉम्ब ऑफ सैंड प्रतिष्ठित इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार जीतने वाली किसी भी भारतीय भाषा की पहली किताब बन गई है। गीतांजलि श्री को 26मई (गुरुवार) को लंदन में इस किताब के लिए पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके साथ उन्हें 5 हजार पाउंड की इनामी राशि भी मिली है। मीडिया रिपार्टस के मुताबिक गीतांजलि इस राशि को डेजी रॉकवेल के साथ शेयर करेंगी। 

मैंने कभी बुकर का सपना नहीं देखागीतांजलि 

गीतांजलि ने बताया कि मैंने कभी इंटरनेशनल बुकर प्राइज जीतने का सोचा भी नहीं था। मैंने अपने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं ऐसा कर सकूंगी। ये पुरस्कार मिलने से मैं हैरान, खुश, सम्मानित और खुद पर गर्व महसूस कर रही हूं। रेत समाधि,टॉम्ब ऑफ सैंड’ उस दुनिया के लिए एक शोकगीत है, जिसमें हम रहते हैं। इस दौरान अमेरिका के वरमोंट में रहने वाली एक चित्रकार, लेखिका और अनुवादक रॉकवेल ने उनके साथ मंच शेयर किया।

2005 से हुई थी इस पुरस्कार की शुरुआत

गीतांजलि ने 80 साल की नायिका मा, अपने परिवार की व्याकुलता के कारण, जो अचानक एक दिन पाकिस्तान यात्रा का फैसला कर लेती है। भारत-पाकिस्तान विभाजन की पीड़ा में डूबे इस उपन्यास के पात्र रिश्तों के नए आयाम सामने रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज हर वर्ष किसी अंतरराष्ट्रीय भाषा से इंग्लिश में ट्रांसलेट किए गए और इंग्लैंड या आयरलैंड में छपे उपन्यास के लिए दिया जाता है। 

जानें गीतांजलि श्री

गीतांजलि, उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले की रहने वाली हैं । वे 3 उपन्यास और कई कथा संग्रह की लेखिका हैं। उनकी कृतियों का अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, सर्बियन और कोरियन भाषाओं में ट्रांसलेट किया जाता है। 

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