स्वरूपानंद सरस्वती नहीं रहे:द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य को आज दी जाएगी समाधि

लोकमतसत्याग्रह/ज्योतिर्मठ और द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का रविवार को निधन हो गया। 9 साल की उम्र में घर छोड़ने वाले स्वरूपानंद सरस्वती को 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली थी। आज उन्हें समाधि दी जाएगी।

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का रविवार को 98 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें माइनर हार्ट अटैक आया। मध्य प्रदेश में नरसिंहपुर जिले के झोतेश्वर के परमहंसी गंगा आश्रम में उन्होंने अंतिम सांस ली। शंकराचार्य लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

वह मप्र के नरसिंहपुर स्थित झोतेश्वर आश्रम में ही निवास करते थे. द्वारका और ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य का अंतिम संस्कार उनके इसी आश्रम में होगा. चूंकि वह शीर्ष साधु-संत थे, लिहाजा हिंदू परंपरा के अनुसार उन्हें भू समाधि दी जाएगी

शंकराचार्य का पद क्यों अहम

शंकराचार्य का पद हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है. हिंदुओं का मार्गदर्शन एवं भगवान को प्राप्त करने के साधन जैसे विषयों में हिंदुओं को आदेश देने के विशेष अधिकार शंकराचार्यों को ही मिले होते हैं. हिंदुओं को संगठित करने की भावना से आदिगुरु भगवान शंकराचार्य ने 1300 वर्ष पूर्व भारत के चारों दिशाओं में चार धार्मिक राजधानियां (गोवर्धन मठ, श्रृंगेरी मठ, द्वारका मठ एवं ज्योतिर्मठ) बनाईं. स्वामी स्वरूपानंद इनमें से दो पीठ के प्रमुख थे. इसलिए उनका दर्जा काफी अहम और खास भी था.

आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी साधू भी बने

आजादी की लड़ाई में भी स्वामी स्वरूपानंद का खास योगदान था. 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा तो वह भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. 19 साल की उम्र में वह ‘क्रांतिकारी साधु’ के रूप में प्रसिद्ध हुए. इस दौरान बनारस जेल में 09 महीने और फिर मध्य प्रदेश की जेल में 06 महीने की सजा काटी. जब स्वामी करपात्री महाराज ने अपना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ा तो वह इस राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे. 1950 में वह दंडी संन्यासी बनाये गए. 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली.

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