लोकमतसत्याग्रह/राजस्थान में कहा जाता है कि रेगिस्तान में दूर चमकती रेत को देखकर जिन्हें वहाँ पानी होने का भ्रम नहीं होता, ज़रूर उनकी प्यास में कोई कमी रही होगी। अशोक गहलोत और सचिन पायलट समर्थक विधायकों को पानी दिख रहा है। वे उसे सबसे पहले पीकर अपनी प्यास बुझाने के लिए बेइंतहा दौड़ भी रहे हैं। यह जानते हुए कि वहाँ पानी नहीं, रेत ही है। मृग मरीचिका इसे ही कहते हैं।
अशोक गहलोत पार्टी अध्यक्ष बनने की तैयारी कर रहे हैं लेकिन चाहते हैं कि मुख्यमंत्री पद पर उनका उत्तराधिकारी भले ही कोई भी हो, लेकिन सचिन पायलट न हो। सचिन के खिलाफ उनके और उनके समर्थकों के पास पर्याप्त और तगड़ी वजह भी है। सब जानते हैं मुख्यमंत्री बनने के लिए सचिन पायलट कांग्रेस पार्टी से बगावत पर उतर आए थे। यही सबसे बड़ा हथियार गहलोत ख़ेमे के पास है। देर रात सत्तर विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के पास पहुँचकर अपना इस्तीफ़ा उन्हें सौंप दिया है।
माँग सिर्फ़ यह है कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। यह इसलिए हुआ क्योंकि पार्टी विधायक दल की बैठक रविवार को बुलाई गई थी जिसमें नए नेता के बारे में मशविरा होना था। भाई लोग उस बैठक में तो गए नहीं, सीधे स्पीकर के घर जा पहुँचे। अब पार्टी कमान ने गहलोत और सचिन को दिल्ली बुलाया है। वहाँ समझाइश होगी। चेतावनी भी दी जाएगी और कुछ हद तक धमकियाँ भी, लेकिन कोई मानने वाला नहीं है।
माने भी क्यों? सचिन अपने भविष्य को संवारना चाहते हैं। कह सकते हैं कि पिछली बग़ावत पर मैं आपके कहने पर ही ठंडा पड़ा था। अब मौक़ा आया है तो पंगत और कोई जीम जाए, ऐसा मैं होने नहीं दूँगा। बात यहाँ तक भी पहुँच सकती है कि मैं कम विधायकों के साथ ही सही, आपके नए नेता का साथ नहीं देने वाला! हाईकमान को सुनना पड़ेगा।
बेशक, सचिन पायलट गहलोत के सशक्त उत्तराधिकारी हो सकते हैं लेकिन उनकी पिछली बग़ावत उनका पीछा नहीं छोड़ रही है। आगे सब कुछ पार्टी आलाकमान पर निर्भर है कि वह गहलोत को समझा- बुझा कर सचिन को आगे करता है या गहलोत की बात को वजन देता है। जहां तक विधायकों के इस्तीफ़े का सवाल है, यह सब राजनीतिक ताक़त दिखाने के तरीक़े हैं। आलाकमान के इशारे पर तमाम इस्तीफ़े वापस भी हो सकते हैं और फिर से पार्टी में अमन- चैन भी आ सकता है
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्रीय पर्यवेक्षकों (अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे) को दो टूक जवाब दिया है कि वह कांग्रेस के वफादार के लिए कुर्सी छोड़ेंगे, गद्दार के लिए नहीं. फिलहाल गहलोत अपना समर्थन दिखाने और शक्ति प्रदर्शन करने के बाद मामले को ठंडा रखना चाहते हैं. उनके समर्थक कह रहे हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का फैसला होना चाहिए. इस मामले में कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए. अशोक गहलोत और उनके समर्थक विधायकों को अब आलाकमान के अगले निर्देश का इंतजार है. वहीं सचिन पायलट ने इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साध रखी है. दरअसल, दो साल पहले सचिन पायलट की बाड़ेबंदी की याद दिलाकर अशोक गहलोत और उनके समर्थक उन्हें गद्दार बोल रहे हैं.
वे किसी भी कीमत पर उनको मुख्यमंत्री नहीं बनने देना चाहते. गहलोत समर्थित विधायकों का आरोप है कि सचिन पायलट ने बीजेपी के साथ मिलकर राजस्थान में सत्ता परिवर्तन की नाकाम कोशिश की थी. उनकी वफादारी पार्टी के प्रति नहीं, बल्कि पद के प्रति है. कांग्रेस के करीब 85 विधायकों का कहना है कि अगर अशोक गहलोत मुख्यमंत्री पद छोड़ते हैं, तो उनका कोई करीबी ही कुर्सी पर बैठना चाहिए. वे सचिन पायलट को कतई स्वीकार नहीं करेंगे. आलाकमान चाहे तो किसी तीसरे को सीएम बना दे. सूत्रों की मानें तो अशोक गहलोत की भी यही शर्त है. केंद्रीय पर्यवेक्षक बनकर जयपुर पहुंचे अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे न तो सभी विधायकों से वन टू वन बात कर पाए, न ही अशोक गहलोत ने विधायक दल की बैठक ही होने दी. अब दोनों ऑब्जर्वर दिल्ली जाकर सोनिया गांधी से बात करेंगे.
अब राजस्थान में कांग्रेस विधायक दल की बैठक 19 अक्टूबर के बाद होगी
राजस्थान में नए सीएम को लेकर पैदा हुए राजनीतिक संकट को शांत रखने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने अब आगामी 19 अक्टूबर तक विधायक दल की बैठक नहीं कराने का फैसला लिया है. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच छिड़े सियासी जंग के कारण रविवार रात यह फैसला लिया गया. अब राजस्थान में विधायक दल की बैठक कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के बाद होगी. सभी कांग्रेस विधायक 19 अक्टूबर के बाद दिल्ली जाएंगे और सोनिया गांधी से मुलाकात करेंगे. ऐसा माना जा रहा था कि अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ेंगे और राजस्थान में सचिन पायलट की सीएम के रूप में ताजपोशी होगी. लेकिन गहलोत गुट की बगावत के कारण सीएम की कुर्सी सचिन पायलट के पास आते-आते रह गई.


