ग्वालियर में साम्प्रदायिक सदभाव की मिसाल:अपने नहीं आए तो मुस्लिम भाइयों ने दिया बुजुर्ग की अर्थी को कंधा, बेटी ने दी मुखाग्नि

लोकमतसत्याग्रह/ग्वालियर में सांप्रदायिक सदभाव की एक नई मिसाल देखने को मिली है। 90 साल की बुजुर्ग रामदेही माहौर की मौत के बाद जब अपने कंधा देने नहीं आए तो मुस्लिम परिवार के चार भाई वृद्धा की अर्थी के कंधा बने। बुजुर्ग को दिल्ली से आकर उसकी बेटी ने मुखाग्नि दी। जब तक दिल्ली से बेटी नहीं आई मुस्लिम परिवार ने एक हिंदू परिवार की तरह बुजुर्ग की देखभाल की और मुक्तिधाम तक ले गए।

यह घटना ग्वालियर के न्यू रेलवे कॉलोनी में दरगाह परिसर की है। अपनो से ठुकराने के बाद महिला दरगाह परिसर में ही रह रही थी। यह वाक्या उन लोगों के लिए सबक है जो हिंदू व मुस्लिम दो समुदाय को अलग समझते हैं। पर ग्वालियर में नजर आ गया कि धर्म अलग, रिति रिवाज व संस्कार अलग हो सकते हैं, लेकिन भावनाएं कभी अलग नहीं होतीं।

ग्वालियर के न्यू रेलवे कॉलोनी के पास दरगाह निवासी 90 वर्षीय रामदेही माहौर के परिवार में उनकी एक बेटी शीला माहौर (45) पत्नी तुलाराम के अलावा कोई नहीं है। बेटी दिल्ली की मंगोलपुरी बी-ब्लॉक में रहती है। यहां रामदेही अपने भाइयों के साथ रहती थी। पर कुछ साल पहले भाइयों की मौत के बाद वह बेसहारा हो गई। भतीजे उसे खाना नहीं देते थे। बेरहमी से पीटते थे कुछ महीने पहले उसे घर से निकाल दिया था। इसके बाद न्यू रेलवे कॉलोनी में रहने वाला नगर निगम कर्मचारी शाकिर खान का परिवार ही बुजुर्ग महिला का सहारा बना। जब अपनों ने ठुकराया तो पड़ोसियों ने बुजुर्ग को आसरा दिया। इसके बाद शाकिर ने ही उनको दरगाह परिसर मंे रहने का इंतजाम किया। वहां बने एक रूम में बुजुर्ग के रहने की सारी व्यवस्था की गई। इसके साथ ही उसे खाना दिया जाता था। एक बेटे की तरह सारे फर्ज निभाए। दिल्ली में बेटी शीला से रोज बात भी कराते थे। पर गुरुवार को अचानक बुजुर्ग महिला की 90 साल की उम्र में निधन हो गया। अब उसके अंतिम संस्कार का संकट आ खड़ा हुआ।

अपनों ने मुंह मोड़ा तो मुस्लिम कंधों ने दिया सहारा
– बुजुर्ग महिला की मौत के बाद शाकिर खान ने दिल्ली में उसकी बेटी को सूचना दी। साथ ही यहां उसके रिश्तेदारों, भतीजों को खबर भिजवाई। बेटी मां की मौत खबर मिलते ही ग्वालियर पहुंच गई, लेकिन 100 से 200 मीटर की दूरी पर रहने वाले भतीजे नहीं आए। जब मृतका की बेटी घर आ गई तो संकट खड़ा हो गया कि परिवार के चार सदस्य कंधा देकर पार्थिव देह को मुक्तिधाम तक ले जाते हैं। बेटा या भतीजा मुखाग्नि देता है। पर जब अपने नहीं आए तो शाकिर खान ने यह फर्ज भी निभाया। उन्होंने अपने भाइयों मफदूत खान, मासूम खां, इरफान खान के साथ मिलकर बुजुर्ग की अर्थी को न सिर्फ कंधा दिया बल्कि बैंड बाजों से मातमी धुन के बीच उनकी शवयात्रा निकाली। जिससे ऐसा न लगे कि मृतका का कोई अपना नहीं है।
बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज
– श्मशान घाट में जब पार्थिव देह पहुंच गई तो यह संकट सामने आ गया कि अब चिता को मुखाग्नि कौन देगा, क्योंकि यह फर्ज एक बेटे या भाई, भतीजे का होता है। पर बुजुर्ग के यह तीनों ही नहीं थे। इस पर बुजुर्ग की 45 वर्षीय बेटी ने फैसला लिया कि वह अपनी मां के लिए बेटे का फर्ज पूरा करेगी। उसके इस फैसले की सभी ने सराहना की। इसके बाद शीला ने अपनी मां की चिता को मुखाग्नि देकर सारे संस्कार पूरे किए हैं। अब वही मां के फूल अस्थि संचय कर हरिद्वार भी जाएगी।
इंसान की मदद करनी चाहिए यही तो हर धर्म सिखाता है
– बुजुर्ग महिला को कंधा देने वाले शाकिर का कहना है कि हम इंसान हैं और वो भी इंसान थीं। एक इंसान दूसरे इंसान की मदद करे यही तो हिंदू और मुस्लिम धर्म सिखाता है। कोई कुछ भी कहे, लेकिन हम एक हैं और एक ही रहेंगे।
आज मुझे मेरे भाई मिल गए
– मां को मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाने वाली शीला का कहना है कि मां के लिए मैं ही बेटी और बेटा थी। इसलिए मैंने उनके अंतिम संस्कार का पूरा फर्ज निभाया है। मोहल्ले लोगों ने अलग धर्म का होकर भी काफी मदद की है। मुझे लगा मेरा परिवार मिल गया है।

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