गांधी की हत्या से ग्वालियर कनेक्शन:500 रुपए में पिस्तौल खरीदकर स्वर्ण रेखा नदी के किनारे गोडसे ने सीखा था निशाना लगाना

लोकमतसत्याग्रह/सोमवार 30 जनवरी को देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 74वीं पुण्यतिथि है। हाल ही में गांधी और उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के ऊपर एक फिल्म “गांधी गोडसे एक युद्ध” को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं कि महात्मा गांधी की हत्या से ग्वालियर का गहरा नाता है। “गांधी गोडसे एक युद्ध” मूवी में ग्वालियर का कहीं जिक्र नहीं है। पर गांधी की हत्या में उपयोग होने वाली पिस्तौल उस समय 500 रुपए में ग्वालियर से ही खरीदी गई थी। जिसे हिंदू महासभा के नेता ने दिलाया था।

गांधीजी की हत्या से पहले 4 दिन नाथूराम गोडसे व नारायण आप्टे ग्वालियर में ही ठहरे थे। यहां सिंधिया महल के सामने स्वर्ण रेख नाले के सूनसान इलाके में नाथूराम व आप्टे ने पिस्तौल से गोली चलाना सीखा था। इसके बाद 29 जनवरी को गोडसे व आप्टे ट्रेन पकड़कर ग्वालियर से दिल्ली पहुंचे जहां 30 जनवरी को दोनों ने गांधी की हत्या कर दी। अब हिंदू महासभा का कहना है कि फिल्म में ग्वालियर का जिक्र नहीं है, पिस्तौल कहां से खरीदी नहीं दिखाया गया।

ग्वालियर में ही गांधी की हत्या का बुना गया ताना बाना
– 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्रार्थना सभा से उठे थे तो उसी दौरान नाथूराम गोडसे ने बापू के सीने को गोलियों से छलनी कर दिया था, लेकिन यह हत्याकांड कोई एक दिन की प्लानिंग नहीं थी। गांधीजी की हत्या की साजिश आजादी के 7 दिन पहले से शुरू हो गई थी। एक बार अपने प्रयास में गोडसे विफल हो चुका था। इसलिए इस बार वह कोई मौका देना नहीं चाहता था।
हिंदू महासभा के यह दो बड़े नेता की थी अहम भूमिका
30 जनवरी 1948 से 4 दिन पहले नाथूराम गोडसे अपने साथी प्रोफेसर नारायण आप्टे के साथ ग्वालियर पहुंचा। यहां से वह दौलतगंज स्थित हिंदू महासभा के भवन पहुंचे। ग्वालियर में वह 4 दिन तक रुके। यहीं गांधीजी की हत्या की पूरी प्लानिंग की गई। यहां हिंदू महासभा के नेता डॉक्टर परचुरे और गंगाधर दंडवत ने उनकी मदद की।
शिंदे की छावनी पर नाश्ता, शाम को मूंगफली खाते थे
– हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. जयवीर भारद्वाज की माने तो गोडसे और नारायण आप्टे गांधी हत्या से पहले ग्वालियर में ही रुके थे। यहां चार दिन तक उनकी दिनचर्या सामान्य थी। सुबह शिंदे की छावनी पर एक नाश्ता दुकान पर नाश्ता करते थे। दिन में हिंदू महासभा के एक नेता के यहां खाना और शाम का समय सड़कों पर टहलते हुए मूंगफली खाकर निकल जाता था।

स्वर्ण रेखा नदी के किनारे चलाना सीखी थी पिस्तौल
नाथूराम गोडसे ने जिस पिस्तौल से बापू की हत्या की थी, उस पिस्तौल को ग्वालियर से 500 रुपए में खरीदा था। वह समय रियासत काल का था और आसानी से यहां बिना लाइसेंस के पिस्तौल मिल जाती थी। अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयवीर भारद्वाज ने बताया कि यह पिस्तौल को चलाने के लिए नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे ने ग्वालियर में ही रुककर तीन दिन तक पूरी प्रैक्टिस की थी। वह दौलतगंज महासभा के भवन में ही ठहरे थे। सिंधिया के महल के सामने स्वर्ण रेखा नदी के पास यहां पिस्तौल को चलाना और सटीक निशाना लगाने की प्रैक्टिस की थी।
ग्वालियर से ही 29 जनवरी 1948 को पहुंचे थे दिल्ली
हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बताते हैं कि 3 दिन तक यहीं प्रैक्टिस करने के बाद गोडसे और आप्टे 29 जनवरी की सुबह ग्वालियर रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़कर दिल्ली के लिए रवाना हुए। 29 की सुबह उनको रवाना होना था, लेकिन 28 जनवरी की रात को उन्हें मिशन को लेकर काफी बैचेनी हो रही थी। ढंग से नींद भी नहीं आई थी। रात को उन्होंने समय बिताने के लिए मूंगफली मंगाकर खाई थी।
1935 से हिंदू महासभा का गढ़ है ग्वालियर
ग्वालियर शुरू से ही हिंदू महासभा का गढ़ रहा है। मध्य भारत हिंदू महासभा का प्रमुख कार्यालय है। अखिल भारतीय हिंदू महासभा की स्थापना यहीं 1935 में वीर सावरकर ने की थी। यही वजह है कि बापू की हत्या करने वाले गोडसे का ग्वालियर से गहरा नाता रहा है। ग्वालियर में जब हिंदू महासभा का गढ़ बना ही था, तब से नाथूराम गोडसे ग्वालियर आया-जाया करते थे। यहां के दफ्तर में 1947 में नाथूराम गोडसे ने कुछ दिन भी बिताएं हैं। यहां हिंदू महासभा गोडसे का मंदिर तक बना चुकी है।
किताब में भी गांधी जी की हत्या का उल्लेख
महात्मा गांधी की हत्या की साजिश 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति से एक सप्ताह पहले ही रच ली गई थी। यह दावा एक किताब में किया गया है। इस किताब में हत्या के लिए इस्तेमाल की गई बेरेटा पिस्तौल और ग्वालियर के एक डॉक्टर दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे द्वारा इसकी व्यवस्था किए जाने सहित पूरी घटना का विवरण पेश किया गया है। अप्पू एस्थोस सुरेश और प्रियंका कोटमराजू द्वारा लिखी गई किताब ‘द मर्डरर, द मोनार्क एंड द फकीर: ए न्यू इन्वेस्टिगेशन ऑफ महात्मा गांधीज असैसिनेशन’ गांधी की हत्या की परिस्थितियों, इसके कारणों और इसके बाद की जांच आदि पर प्रकाश डालती है।
गांधी गोडसे एक युद्धफिल्म पर यह ऐतराज
– हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. जयवीर भारद्वाज का कहना है कि “गांधी गोडसे एक युद्ध” फिल्म से युवा गोडसे के विचारों को समझेंगे, लेकिन फिल्म में कई कमी हैं। इसमें ग्वालियर का जिक्र नहीं है, जबकि ग्वालियर ही उनकी हत्या की साजिश का गढ़ था। हत्या मंे पिस्तौल कहां से खरीदी यह भी नहीं है। गोडसे के साथ नारायण आप्टे ने भी बराबर हत्या में शामिल थे, लेकिन उनका उल्लेख उस स्तर पर नहीं है।

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