अंग्रेजी बोलना तो दूर, पढ़कर सुना भी नहीं पाते, ऐसे शासकीय अधिवक्ता किए नियुक्त

लोकमतसत्याग्रह/मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में शासन ने पैरवी के लिए शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति की है। इसमें कई अधिवक्ता ऐसे हैं, जो अंग्रेजी बोलना तो दूर, ढंग से पढ़कर सुना भी नहीं पाते हैं। यही नहीं इनमें से एक शासकीय अधिवक्ता तो सजायाफ्ता है, ऐसे अधिवक्ताओं को भी लिस्ट में जगह दी गई है। नियुक्ति के समय न चरित्र का ध्यान रखा गया न अनुभव का, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो गई है। कोर्ट शासकीय अधिवक्ता से जो मार्गदर्शन व सवालों के जवाब चाहता है, वह भी नहीं मिल पाते हैं। स्थिति यह है कि जो काम शासकीय अधिवक्ताओं को करना चाहिए, वह न्यायालय को करना पड़ रहा है। किसी याचिका में जवाब देने के लिए स्टेनो के भरोसे हैं, खुद बोलकर जवाब नहीं लिख पाते हैं।

 महाधिवक्ता कार्यालय में काम रह रहे अधिवक्ताओं के बारे में जाना तो यह तथ्य सामने आए। नाम न बताने की शर्त पर कार्यालय के शासकीय अधिवक्ताओं व कर्मचारियों ने कार्यप्रणाली की हकीकत बताई। साथ ही हाई कोर्ट की लाइव सुनवाई में भी अधिवक्ताओं की अक्षमता नजर आई। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की एकलपीठ ने गत दिवस एक जमानत याचिका का निराकरण करते हुए शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए थे। कोर्ट ने कहा था कि शासन ने अक्षम अधिवक्ताओं की नियुक्ति कर दी है, ये न्यायालय का मार्गदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। विधि विभाग के प्रमुख सचिव को आदेश की कापी भेजने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह तक कहा कि अच्छे अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर विचार करना चाहिए। वहीं इस मामले में शासकीय अधिवक्ता अंकिता माथुर ने बताया कि न्यायालय में आपराधिक प्रकरण में संबंधित पुलिस द्वारा जो केस डायरी भेजी गई उसमें संपूर्ण दस्तावेज ना होने के कारण न्यायालय के समक्ष तथ्य नहीं रखे जा सके थे, इसी तरह कई बार अन्य शासकीय अधिवक्ताओं को भी न्यायालय के सामने कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

ऐसे प्रभावित हो रहा है कार्य

– हाई कोर्ट में जजों की संख्या कम है, सिर्फ छह जज काम कर रहे हैं। ग्वालियर खंडपीठ में 80 हजार 820 केस लंबित हैं। एक बैंच में 200 से अधिक केस लिस्ट किए जाते हैं। काजलिस्ट में शामिल किए केसों की सुनवाई सुबह सवा दस से शाम साढ़े चार बजे तक खत्म करना है। ऐसी स्थिति में शासकीय अधिवक्ता की अहम जिम्मेदारी होती है। पक्षकार का अधिवक्ता तो पूरी तैयारी के साथ पहुंचते हैं, लेकिन शासन के अधिवक्ता तैयारी के साथ नहीं पहुंचे। इस कारण केस की सुनवाई में समय लगता है।

 कार्यालय में जो जवाब बनाए जाते हैं, उन्हें स्टेनो के भरोसे छोड़ दिया है। स्टेनो टाइप करके जवाब देता है, सिर्फ हस्ताक्षर कराने का काम अधिवक्ता करता है। जवाब तैयार करते समय फाइल भी नहीं देखते हैं।

– अधिवक्ता जमानत के मामलों में पैरवी के लिए डायरियां भी पढ़कर नहीं जाते हैं। यह भी नहीं देखते कि डायरी में कौनसा कागज आया है या नहीं। द्य ऐसे अधिवक्ताओं को जिम्मेदारी दी गई है, जो दतिया, ग्वालियर, मुरैना के जिला कोर्ट में पैरवी करते थे, अब हाई कोर्ट में आ गए हैं। द्य कुछ अधिवक्ताओं की स्थिति ऐसी है कि उनके पास डिग्री है, लेकिन वकालत नहीं की। सरकार में दखल होने के बाद नियुक्ति ले ली।

पैनल के भरोसे छोड़ा काम

– सरकार हर महीने पांच अतिरिक्त महाधिवक्ताओं को आठ लाख 75 हजार रुपये वेतन दे रही है। गाड़ी व सुरक्षा जवान अलग से हैं। तीन लाख 20 हजार रुपये उप महाधिवक्ताओं पर खर्च हो रहे हैं। 35 लाख रुपये महीना शासकीय अधिवक्ताओं पर खर्च किए जा रहे हैं। लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी काम पैनल के भरोसे छोड़ दिया है।

पैनल को भेजे जाने को लेकर भी न्यायालय आपत्ति कर चुका है कि जब इतने शासकीय अधिवक्ता हैं तो पैनल को क्यों भेजा जा रहा है। कुछ दिनों इन्हें भेजना बंद किया था, लेकिन फिर से जाना शुरू कर दिया है।

शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति को लेकर हाई कोर्ट ने क्या कहा है, किस परिस्थिति में ऐसा आदेश पारित करना पड़ा, इसकी जानकारी ले रहा हूं। विधि विभाग के प्रमुख सचिव से भी इस संबंध में चर्चा करेंगे, फिर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

प्रशांत सिंह, महािधवक्ता, मप्र शासन

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