लोकमतसत्याग्रह/चुनाव जीतकर आए जनप्रतिनिधियों की शिकायतों से परेशान एक मंत्री एक अफसर पर बिफर पड़े। ऊंची आवाज में उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। चूंकि ये वाकया ‘सरकार’ के घर पर हुआ, इसलिए अफसर को पड़ रही फटकार उनके कानों तक पहुंच गई। फिर क्या था, जो काम कई महीनों से नहीं हो रहा था, वो फटाफट हो गया।हुआ यूं कि मंत्री जब भी फील्ड का दौरा करते तो जनप्रतिनिधि उनसे फंड नहीं मिलने की शिकायतें करते। हाल ही में एक बैठक के सिलसिले में मंत्री का ‘सरकार’ के घर जाना हुआ। यहां विभाग के एक बड़े अफसर से उनका सामना हो गया। उन्हें देखते ही मंत्री का गुस्सा फूट पड़ा। मंत्री ने ऊंची आवाज में बोलना शुरू कर दिया। उन्होंने अफसर से कहा- आपकी वजह से सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। जनप्रतिनिधि सात-आठ महीनों से फंड का इंतजार कर रहे हैं और आप यहां कागजों में उलझाए बैठे हैं। ये रवैया ठीक नहीं।
अफसर ने दिल्ली से पैसे नहीं मिलने की बात कही, इस पर मंत्री और भड़क गए। उन्होंने अफसर से कहा- फालतू के बहाने मत बनाओ। आप फंड रिलीज कराओ। मंत्री का मिजाज देख अफसर ने ‘हामी’ भर दी।
मंत्री की फटकार और ‘सरकार’ के कानों तक ये बात पहुंचने का असर ये हुआ कि अगली बैठक में जब मंत्री पहुंचे, तो अफसर उन्हें देखते ही खड़े हो गए। उनके पास गए और कहा- आपने जो काम बताया था वो हो गया। बता दें कि ये मंत्री निमाड़ से लगे नर्मदा पट्टी के एक जिले से ताल्लुक रखते हैं और खुद एक बड़े किसान भी हैं।
बंगला नहीं मिलने से दुखी सांसद
ग्वालियर-चंबल अंचल से बीजेपी के एक सांसद इन दिनों खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। कभी अंचल के एक बड़े शहर की सरकार के मुखिया रहे सांसद सरकारी बंगला नहीं मिलने से परेशान हैं। वे अपने ही शहर में बंगले को तरस गए हैं। ये स्थिति तब है जब अन्य सांसद के साथ मंत्री, विधायक और चुनाव हारे बीजेपी के कैंडिडेट को इसी शहर में बंगले मिले हैं।
उम्र दराज ये सांसद अपनी शांत और सरल छवि के कारण चुनावों में सफल होते रहे हैं, लेकिन बंगला पाने में वे पीछे रह गए। अब सांसद के करीबी कह रहे हैं कि उनकी सरलता ही उनकी कमजोरी बनती जा रही है। सुना तो ये भी है कि सांसद की इस सीट पर पार्टी के कई बडे़ नेताओं की नजर है। लिहाजा सांसद ने फिलहाल अपने मन को समझा लिया है।
हाथ मिले, लेकिन दिल नहीं
प्रदेश में कुछ मंत्रियों के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी है। कहने को तो ‘सरकार’ ने उन्हें समझा दिया। विवाद भी थमता नजर आया। लेकिन कहते है ना… कि सियासत में जो दिखता है, वैसा असल में होता नहीं है। दरअसल ‘सरकार’ की समझाइश के बाद भी मंत्रियों के दिल नहीं मिले हैं। हाल ही में हुए एक वाकये से तो ऐसा ही कुछ लगा।
हुआ यूं कि जिन मंत्रियों से बीच विवाद सार्वजनिक हो गया था। उनमें से दो मंत्री बुंदेलखंड में पार्टी संगठन के नेताओं के साथ एक कार्यक्रम में साथ नजर आए। एक-दूसरे के पास बैठे। उनकी एक तस्वीर भी सामने आई। पार्टी की ओर से प्रोग्राम की जो तस्वीरें जारी की गईं, उसमें से दोनों के साथ बैठने वाली तस्वीर भी शामिल है। लेकिन ये तस्वीर कुछ ही मिनटों में डिलीट कर दी गई। अब लोग कह रहे हैं कि तस्वीरों में तो साथ हैं, लेकिन राहें जुदा हैं।
जिला छोटा, लेकिन पॉलिटिक्स ‘पावर‘फुल
प्रदेश का एक नया नवेला जिला। नेतागिरी इतनी हावी कि तीन तहसील और दो विधानसभा क्षेत्र वाला ये डिस्ट्रिक्ट अफसरों के लिए किसी आफत से कम नहीं है। कलेक्टर तक इस जिले में नहीं टिकते। ताजा मामले में डेढ़ महीने के अंदर यहां कई डीईओ मतलब जिला शिक्षा अधिकारी आ गए।
हुआ यूं कि यहां तैनात डीईओ साहब जैसे ही रिटायर हुए तो लोकल लीडर्स ने अपने पावर का इस्तेमाल किया और अपनी पसंद के डीईओ की पोस्टिंग करा दी। दो अलग-अलग नेताओं की पसंद से जिले में दो डीईओ की पोस्टिंग के ऑर्डर जारी हो गए। इसके बाद एक पावरफुल नेता ने अपने पंसदीदा को जॉइन करा दिया। बात ‘सरकार’ तक पहुंची तो अब यहां नया डीईओ भेजा गया है।
बुंदेलखंड में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले एक संगठन ने हाल ही में कांग्रेस पार्टी का दाम थाम लिया है। ये सभी हनुमान भक्त के रूप में गाजे-बाजे के साथ प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पहुंचे। यहां हनुमान चालीसा पाठ के लिए बड़ी तैयारी की गई थी। पंडाल सजाकर कुर्सियां लगाई गईं। प्रोफेशनल गायक और धोती कुर्ता पहने ‘ब्राह्मण कुमारों’ को भी बुलाया गया था। लेकिन जैसे ही जुलूस दफ्तर के गेट पर पहुंचा, धक्कामुक्की शुरू हो गई। ऐसे में इन्होंने गेट पर ही खडे़-खड़े हनुमान चालीसा पाठ शुरू कर दिया।
इसकी तस्वीरें विरोधियों तक पहुंची तो सवाल उठने लगे कि भगवान की भक्ति पवित्रता के साथ करनी चाहिए। जूते-चप्पल पहनकर नहीं। विरोधी अब तंज कस रहे हैं कि ये सब संगति का असर है।


