लोकमतसत्याग्रह/मध्यप्रदेश में टीचर पद के लिए दिव्यांग कोटे के आरक्षित 755 पदों में से 450 शिक्षक मुरैना जिले से चुने गए। दिव्यांगता के नाम पर ज्यादातर इनमें से बहरे हैं लेकिन जो पूछो, उसका फर्राटे से जवाब देते हैं।
दरअसल, ये सारा खेल विकलांगता के फर्जी सर्टिफिकेट से रचा गया है। कर्मचारी चयन मंडल मध्यप्रदेश द्वारा आयोजित प्राथमिक शिक्षक पद की पात्रता परीक्षा में नखनौजी, अटेर भिंड के राहुल शर्मा की 56वीं रैंक थी। 150 अंकों में उन्हें 124.84 अंक मिले थे। उनका बिना किसी सर्टिफिकेट के सीधे चयन हो सकता था, लेकिन राहुल शर्मा ने दिव्यांग कोटे से फॉर्म भरा था। जांच में पता चला कि उनका दिव्यांग प्रमाण पत्र फर्जी है। नौकरी तो जा चुकी है, एफआईआर की भी तैयारी है।
सरकार ने ऐसे 80 लोगों पर मामला दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं। इनमें से 77 की रिपोर्ट आ चुकी है। ओवरराइटिंग वाले तीन प्रमाण पत्रों की जांच जारी है। दैनिक भास्कर ने दिव्यांग कोटे से हुई टीचर भर्ती फर्जीवाड़े की पड़ताल की, तो चौंकाने वाली बात सामने आई। कई के प्रमाण पत्रों पर ऐसे सरकारी डॉक्टरों के दस्तखत हैं, जो पहले ही रिटायर हाे चुके हैं।
18 हजार शिक्षकों की भर्ती से जुड़ा मामला
कर्मचारी चयन मंडल ने प्राथमिक शिक्षक के 18 हजार पदों के लिए पात्रता परीक्षा कराई थी। इसमें 1086 पद दिव्यांगों के लिए आरक्षित थे। परिणाम के आधार पर 755 पदों पर आवेदकों का चयन हुआ है। चौंकाने वाली बात ये है कि इनमें से 450 दिव्यांग टीचर सिर्फ मुरैना जिले से चुने गए हैं। एक जिले से इतनी संख्या में दिव्यांग टीचर बनने का मामला सामने आने के बाद से ही सवाल उठने लगे थे।
दिव्यांगों ने इस मामले में आयुक्त नि:शक्तजन कल्याण संदीप रजक से शिकायत की थी। उन्होंने आयुक्त लोक शिक्षण एवं आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग को नोटिस जारी कर दिव्यांग कोटे से चयनित शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की जांच के निर्देश दिए थे।
भर्ती परीक्षा में सबसे अधिक मुरैना जिले के 450 आवेदकों का चयन हुआ था। दिव्यांग प्रमाण पत्रों की जांच कराई गई तो इनमें से 80 के प्रमाण पत्र संदिग्ध मिले। जांच के बाद 77 के फर्जी होने की पुष्टि हुई। इनमें से 60 स्कूल शिक्षा विभाग और 17 जनजातीय कार्य विभाग में पदस्थ थे। सभी के दिव्यांग प्रमाण पत्र पर विशेषज्ञ चिकित्सक, सिविल सर्जन की सील लगाई गई है। 3 प्रमाण पत्रों पर ओवरराइटिंग की गई है, जिनकी रिपोर्ट आना बाकी है।
फर्जी मिले 80 दिव्यांग शिक्षकों में 53 बहरे
26- दृष्टि बाधित
53- श्रवण बाधित
01- आर्थोपेडिक दिव्यांग
टीचर्स ने खुद तैयार कर ली मेडिकल रिपोर्ट
मुरैना जिला अस्पताल से 2015 से 2017 के बीच सबसे अधिक दृष्टि और श्रवण बाधित प्रमाण पत्र बनाए गए हैं। दृष्टि बाधितों की जांच मुरैना में होती है, लेकिन श्रवण बाधितों को ग्वालियर भेजा जाता है। दरअसल, ग्वालियर-चंबल संभाग सहित टीकमगढ़, छतरपुर जिलों में बहरे या कम सुनने का दावा करने वाले लोगों की जांच के लिए सरकारी अस्पतालों में कोई ऑडियोलॉजिस्ट ही पदस्थ नहीं है। इसके चलते बैरा और ऑडियोमेट्री की जांच के लिए जिला विकलांग पुनर्वास केंद्रों को ग्वालियर के जया आरोग्य अस्पताल (जेएएच) भेजना पड़ता है। वहां से ऑडियोमेट्री या बैरा रिपोर्ट आवेदक द्वारा ही बोर्ड के सामने पेश की जाती है।
बोर्ड ने भी इस जांच रिपोर्ट का प्रमाणीकरण कराए बिना दिव्यांग प्रमाण पत्र जारी कर दिया। कहा जा रहा है कि इसी लूप का फर्जी प्रमाण पत्र बनाने में उपयोग किया गया। जांच में ये तथ्य सामने आए हैं कि कुछ टीचरों ने खुद से तैयार की गई ऑडियोमेट्री और बैरा रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड से दिव्यांग प्रमाण पत्र हासिल किए हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस तरह की फर्जी रिपोर्ट 15 से 20 हजार रुपए में तैयार हो जाती है।
सर्टिफिकेट्स की जांच के लिए पत्र लिख चुके हैं कलेक्टर
मुरैना कलेक्टर अंकित अस्थाना ने आयुक्त लोक शिक्षण अनुभा श्रीवास्तव को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि मुरैना से बने दिव्यांग प्रमाण पत्रों के आधार पर जिन लोगों ने प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षक पद पर नियुक्ति पाई है, उनके दिव्यांग प्रमाण-पत्र भिजवाएं। उनका भी भौतिक सत्यापन होगा।
मुरैना, श्योपुर जिले से जारी हुए मैन्युअल सर्टिफिकेट
मुरैना, श्योपुर जिले से पिछले पांच साल में दिव्यांगता के प्रमाण पत्र मैन्युली जारी किए गए हैं। उनका रिकॉर्ड भी अस्त-व्यस्त है। कई डॉक्टर रिटायर हो चुके हैं। इसका भी फायदा फर्जीवाड़ा करने वाली गैंग ने उठाया है।
ऑडियोलॉजिस्ट के किए फर्जी हस्ताक्षर
455 चयनित शिक्षकों में से 80 के प्रमाण पत्र फर्जी मिले हैं। इनमें से 53 लोगों ने बहरे और कम सुनने वाली श्रेणी में दिव्यांग प्रमाण पत्र तैयार कराए हैं। जांच से पता चला है कि इन शिक्षकों ने ऑडियोमेट्री और बैरा रिपोर्ट खुद या गिरोह द्वारा बनाकर प्रस्तुत की है। इन रिपोर्ट्स पर ऑडियोलॉजिस्ट की न तो राइटिंग है और न ही हस्ताक्षर हैं। इन पर राइटिंग और हस्ताक्षर की कॉपी करने का प्रयास किया गया है।
बहरेपन का प्रमाण पत्र बनवाने के लिए ट्रेनिंग लेकर आते हैं लोग
सामान्यत: आवेदक बहरा या कम सुनने का दिव्यांग प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए ट्रेनिंग लेकर आते हैं। आमतौर पर बहरेपन की जांच ऑडियोमेट्री टेस्ट से ही की जाती है। एक फ्रीक्वेंसी की आवाज उनके कान में छोड़ी जाती है। यदि आवेदक सुनाई देने से मना करता है तो उसे बहरे या कम सुनने की श्रेणी का दिव्यांग मानकर बोर्ड द्वारा प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाता है। बहुत विशेष या शिकायत पर ही बैरा टेस्टिंग की जाती है।
दरअसल, लंबे समय तक अस्पतालों में बैरा टेस्टिंग की मशीन ही नहीं थी। 2018 में इस तरह की मशीनें कुछ जिला अस्पतालों को मिली हैं। तब से जिला पुनर्वास का बोर्ड श्रवण बाधित होने का प्रमाण पत्र बैरा रिपोर्ट पर जारी करने लगा है।
सामान्यत: बहरा व्यक्ति बोल भी नहीं सकता, लेकिन बात कर रहे हैं
पूर्व संयुक्त संचालक सामाजिक न्याय विभाग आरपी सिंह के मुताबिक प्रदेश में अधिकतर सरकारी अस्पतालों में ऑडियोलॉजिस्ट नहीं हैं। सामान्यत: बहरा व्यक्ति बोल भी नहीं पाता है, लेकिन बहरे होने का प्रमाण पत्र लेकर दिव्यांग शिक्षक बने कई लोग धड़ल्ले से बात कर सकते हैं। कायदे से ऐसे सभी लोगों की जांच एक मेडिकल बोर्ड गठित कर सरकार को करानी चाहिए। खुद ग्वालियर जेएएच अस्पताल के ऑडियोलॉजिस्ट डॉ. रोहित गुप्ता भी साफ कर चुके हैं कि कई दिव्यांग प्रमाण पत्रों के लिए जारी किए गए ऑडियोमेट्री और बैरा रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं। कुछ पर ओवरराइटिंग कर नकल करने का प्रयास जैसा किया जाना प्रतीत हो रहा है।
स्कूल शिक्षा मंत्री बोले– सभी पर दर्ज कराई जा रही है FIR
प्रदेश में दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी करने वाले लोगों के मामले में दैनिक भास्कर ने स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री इंदर सिंह परमार से बात की। मंत्री परमार ने कहा कि फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र की जानकारी मीडिया और दूसरे माध्यम से मेरे संज्ञान में आई थी। मेरी ओर से कलेक्टर को जांच के लिए आदेशित किया गया था। अभी तक एक जिले (मुरैना) से 77 दिव्यांग प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं। इसकी रिपोर्ट स्कूल शिक्षा विभाग को आई है। इसमें 60 स्कूल शिक्षा विभाग में और 17 ट्राइबल विभाग में तैनात हैं। हमने एफआईआर करने के लिए निर्देशित किया है। ट्राइबल को भी पत्र लिखा है, वहां से भी कार्रवाई होने वाली है।
यदि कोई फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर शिक्षक बनता है तो छात्रों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। फर्जी प्रमाण पत्र में दो तरह की बातें सामने आई हैं। कुछ के दिव्यांग प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड जिला अस्पतालों में नहीं मिला है। इसका मतलब वो प्रमाण पत्र अस्पतालों से नहीं बने हैं। 8 प्रमाण पत्रों में क्रमांक आदि स्पष्ट नहीं हो रहा है। इसमें और जांच हो रही है। यदि इसमें अस्पताल की भूमिका सामने आती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी।


