UCC पर मुसलमानों के बाद बौद्ध संगठन भी भड़के:बोले- सरकार हमें जबरन हिंदू-मुसलमान बनाना चाहती है, अलग बौद्ध मैरिज एक्ट बनाने की मांग

लोकमतसत्याग्रह/प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कराने की बात कहकर बड़ी बहस छेड़ दी। इसके बाद मुस्लिम समाज विरोध में आ गया। अब बौद्ध संगठन यूनिफॉर्म सिविल कोड पर भड़क गए हैं। अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ ने यहां तक कह दिया कि क्या इस कानून के जरिए सरकार हमें जबरन हिंदू-मुसलमान बनाना चाहती है। संगठन ने बौद्ध समाज के लिए अलग से बौद्ध मैरिज एक्ट बनाने की मांग की है।

27 जून को पीएम मोदी ने भोपाल में ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ अभियान के तहत भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा- ‘परिवार के एक सदस्य के लिए एक कानून हो और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून हो, तो वह घर कभी चल पाएगा क्या? ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पाएगा? ये (विपक्ष) लोग हम पर आरोप लगाते हैं, लेकिन सच ये है कि यही लोग मुसलमानमुसलमान करते हैं। अगर ये मुसलमानों के सच्चे हितैषी होते तो मुसलमानों के अधिकांश परिवार शिक्षा में पीछे रहते। रोजगार में पीछे रहते। मुसीबत की जिंदगी जीने के लिए मजबूर होते।

UCC पर भड़के हुए हैं बौद्ध

अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष भंते नागतिस्स कहते हैं कि हम समान नागरिक संहिता का विरोध करते हैं। हमारी व्यवस्थाएं अलग हैं। हम उनकी व्यवस्था में कैसे शामिल हो सकते हैं? क्या वे हमसे जबरदस्ती से मार-मारकर मुसलमानी करवाना चाहते हैं? क्या जबरदस्ती हम बौद्धों को हिंदू बनाने की प्रक्रिया चल रही है? ऐसा है, तो लोकतंत्र किस बात का?

लोकतंत्र में हर धर्मावलंबी को अपने-अपने धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने या मनाने का अधिकार है। यह अधिकार हमारा कैसे छीन लिया जाएगा? भंते नागतिस्स कहते हैं कि बौद्ध समाज के बीच इन मुद्दों पर बातचीत जारी है। समाज समान नागरिक संहिता जैसे विचार का विरोध करेगा।

कहा– UCC थोपने जैसा है, तथ्यों के साथ करेंगे विरोध

बौद्ध संगठनों से जुड़े और मध्यप्रदेश में कानूनी पेशेवरों के संगठन, इंडियन लीगल प्रोफेशनल एसोसिएशन (ILPA) के प्रदेश अध्यक्ष मिलिंद वानखेड़े का कहना है कि समान नागरिक संहिता की बात थोपना है। यह बौद्धों के धार्मिक मामलों को प्रभावित करेगी। ऐसे में यह संविधान में वर्णित धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के खिलाफ है। ऐसा होने पर लोग तथ्यों के साथ इसका विरोध करेंगे।

बौद्ध मैरिज एक्ट की जरूरत क्यों

भंते नागतिस्स कहते हैं कि बौद्धों के संस्कार किसी अन्य धर्म के संस्कार और परंपराओं से मेल नहीं खाते। जन्म से लेकर, विवाह, गृहस्थी और मृत्यु तक के सभी संस्कार अन्य धर्मों से भिन्न हैं, इसलिए बौद्ध मैरिज एक्ट की जरूरत है। इसके जरिए ही हमारे संस्कारों को कानूनी मान्यता मिल पाएगी। अभी तक हमारे विवाह और व्यक्तिगत कानूनों को हिंदू विवाह अधिनियम और हिंदू व्यक्तिगत कानूनों से नियमित किया जाता है।

विवाह का पंजीयन भी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत किया जाता है, जो गलत है। कुछ समाजों में तो ब्राह्मण शादी कराने जाते ही नहीं। पहले भी नहीं जाते थे, अब भी नहीं जाते, आगे भी उनकी संभावना नहीं है। अब समाज इसे लेकर जागरूक हाे रहा है। ऐसे में हमें अलग विवाह कानून की जरूरत है। सरकार को इसे जितनी जल्दी हो बनाकर लागू करना चाहिए।

बौद्ध विवाह में सिंदूरदान, फेरे और कन्यादान नहीं

नव बौद्ध परंपरा में विवाह संस्कार की नई पद्धति बनाई गई है। इसमें हिंदू विवाह परंपरा की तरह सिंदूरदान, अग्नि के फेरे अथवा सप्तपदी और कन्यादान नहीं शामिल हैं। भंते नागतिस्स कहते हैं कि बौद्ध परंपरा में विवाह के चार चरण हैं। पहले में चरण में कन्या के पिता कन्या का हाथ वर के हाथ में देते हैं। यह हिंदू विवाह परंपरा में कन्यादान की तरह की रस्म है, लेकिन बौद्ध परंपरा में इसे कन्या समर्पण कहते हैं।

इसके बाद वर पांच प्रतिज्ञाएं करता है। यह प्रतिज्ञाएं तीन बार दोहराई जाती हैं। इसके बाद वर कन्या को धर्मपत्नी स्वीकार करने की घोषणा करता है। उसके बाद कन्या भी पांच प्रतिज्ञाएं तीन बार कहती है। वर को पति के रूप में स्वीकार करने की घोषणा करती है। उसके बाद दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को माला पहनाकर भगवान बुद्ध और बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। संस्कार कराने वाले भिक्षु दोनों के विवाहित होने की घोषणा करते हैं।

अभी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख और पारसियों के लिए अलग विवाह कानून

देश में अभी तक हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख और पारसियों के लिए अलग-अलग विवाह कानून हैं। ये कानून केवल विशेष धर्मावलंबियों पर लागू होता है, इसलिए इन्हें पर्सनल लॉ यानी व्यक्तिगत कानून कहते हैं। हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 से लागू है। इसमें हिंदुओं के साथ जैन, बौद्ध और सिखों को भी शामिल किया गया था। यानी इन तीनों धर्मों के विवाह से जुड़े विवादों को इसके जरिए ही सुलझाया जाता रहा।

बाद में आनंद कारज एक्ट लागू कर सिखों को अलग पंजीयन की सुविधा दी गई। कई राज्यों में यह अब भी लागू नहीं है। पारसियों के लिए विवाह और तलाक का अलग कानून 1936 में ही अस्तित्व में आ चुका था। मुस्लिम विवाह अधिनियम 1939 से ही अस्तित्व में है।

इसका आधार शरीयत यानी इस्लामी कानून है। सन् 1872 में ईसाइयों के लिए अलग विवाह कानून बनाया गया। इन कानूनों के तहत विवाह करने वाले महिला-पुरुष का संबंधित धर्म का होना अनिवार्य है। अंतरधार्मिक यानी दो अलग-अलग धर्मों के महिला-पुरुष के बीच विवाहों को देशभर में विशेष विवाह अधिनियम के तहत पंजीकृत किया जाता है।

महाराष्ट्र सरकार कर चुकी कानून बनाने की कोशिश

महाराष्ट्र सरकार बौद्ध विवाह पर विशेष कानून बनाने की कोशिश कर चुकी है। 2019 में इसके लिए सामाजिक अधिकारिता विभाग के प्रमुख सचिव की अगुवाई में समिति गठित हुई थी। इसने सामाजिक कार्यकर्ताओं, बौद्ध धर्म के आचार्यों और कानूनविदों के साथ मसौदा तैयार किया था। इसमें केवल बौद्ध पद्धति से विवाह के आवश्यक तत्वों और उनको विनियमित करने वाले तत्वों को शामिल किया गया था। इसमें भरण-पोषण, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषयों को स्थान नहीं दिया गया था। बाद में वहां राजनीतिक संकट की वजह से यह कानून अटक गया।

UCC लागू हुआ तो हर धर्म के अलग कानून खत्म हो जाएंगे

  • जानकारों का कहना है कि समान नागरिक संहिता हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम विवाह अधिनियम, ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह अधिनियम और आनंद कारज एक्ट जैसे अलग-अलग कानूनों को खत्म कर देगा।
  • उत्तराधिकार और भरण-पोषण से जुड़ा हिंदुओं-मुसलमानों और ईसाइयों, पारसियों के धार्मिक कानून खत्म हो जाएंगे।
  • संभावना है कि लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 साल से बढ़ाकर 21 साल कर दिया जाए।
  • नए कानून में पिता की संपत्ति पर लड़कियों के अधिकार को फिर से निर्धारित कर भाइयों के बराबर कर दिया जाएगा। अभी तक हिंदू, मुस्लिम और पारसी कानूनों में ऐसा नहीं है। पारसी पर्सनल लॉ में तो गैर पारसी से शादी करने वाली बेटी पिता की संपत्ति का हिस्सा पाने का अधिकार खो देती है।
  • संभावना है कि हिंदू कानून का अनोखा प्रयोग दत्तक ग्रहण, समान नागरिक संहिता का हिस्सा बन सकता है। इसके बाद दूसरे धर्म के लोग भी किसी बच्चे को गोद ले सकेंगे।

बौद्धों की नाराजगी का राजनीतिक प्रभाव भी

बौद्ध अनुयाइयों का कहना है कि समाज समान नागरिक संहिता को लेकर दिए जा रहे बयानों और बौद्धों पर हो रहे हमलों को लेकर डरा हुआ और नाराज है। मध्यप्रदेश में बौद्धों की आधिकारिक आबादी 21 से 25 लाख के बीच है। इस नाराजगी का राजनीति प्रभाव कहीं व्यापक है।

नव बौद्ध आंदोलन का प्रभाव प्रदेश में अनुसूचित जाति के बड़े तबके पर है। अधिकांश लोग भले ही घोषित तौर पर बौद्ध धर्म में दीक्षित नहीं हैं, लेकिन उनके मुद्दों पर उनका मौन समर्थन है। चुनाव में यह नाराजगी सत्ताधारी दल को भारी पड़ सकती है।

जूता पहनकर भगवान बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण करने का भी विवाद

अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ और दूसरे संगठनों का आरोप है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भगवान बुद्ध का अपमान किया है। भंते नागतिस्स कहते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर की 132वीं जयंती पर 14 अप्रैल 2023 को महू में भगवान बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया।

इसमें राज्यपाल मंगूभाई पटेल और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जूता-चप्पल पहनकर अनावरण करने पहुंचे। वहां मौजूद बौद्ध भिक्षुओं ने इसका विरोध भी किया। इसे अनसुना कर जूता-चप्पल पहनकर ही प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्मावलंबियों का अपमान है। भिक्षु महासंघ ने महू के बाबा साहब अंबेडकर मेमोरियल सोसाइटी के सचिव राजेश वानखेड़े पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा लागू करने का आरोप लगाया है।

भंते नागतिस्स का कहना है कि राजेश वानखेड़े ने इस साल 13 अप्रैल को महू में आयोजित कार्यक्रम के मंच से जय श्रीराम के नारे लगवाए। वहां आए डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते भीमराव को बोलने के लिए माइक देने से मना कर दिया। वहां मौजूद लोगों के विरोध के बाद भीमराव को बोलने का मौका मिल पाया। भिक्षु महासंघ राजेश वानखेड़े को हटाकर ट्रस्ट में गैर राजनीतिक नियुक्ति करने और भगवान बुद्ध के अपमान के लिए मुख्यमंत्री से माफी की मांग की है।

बारिश के बीच धरने पर बैठे रहे बौद्ध भिक्षु

अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष भंते नागतिस्स की अगुवाई में कई बौद्ध भिक्षु भोपाल के तुलसी नगर स्थित डॉ. बाबा साहब अंबेडकर जयंती मैदान में धरने पर बैठे रहे। प्रदर्शन 19 जून से शुरू होकर 30 जून तक चला। वे 21 सूत्रीय मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इनमें से बौद्ध मैरिज एक्ट बनाने की मांग प्रमुख है। बौद्ध भिक्षुओं का कहना था कि 30 जून के बाद उन्हें धार्मिक वजहों से यह जगह छोड़कर जाना होगा। ऐसा तीन महीनों के वर्षावास के कारण होगा। बौद्ध परंपरा के मुताबिक इन तीन महीनों में बौद्ध भिक्षु किसी एक विहार में पूरे समय शास्त्रों का अध्ययन और उपासना करते हैं।

संगठन ने ये मांगें भी उठाई

  • प्रदेश में स्थित प्राचीन बौद्ध स्मारकों पर बिजली, सड़क, पानी आदि की सुविधाएं दी जाएं। वहां नई बुद्ध प्रतिमाएं और बौद्ध विहार बनवाएं जाएं।
  • बौद्ध भिक्षुओं को भी कम से कम 10 हजार रुपए मासिक मानदेय दिया जाए। ट्रेन-बस का नि:शुल्क पास बने।
  • जिन प्राचीन बौद्ध स्थलों को बिगाड़कर हिंदू देवताओं की प्रतिमा बना दिया गया है, उनको पुराने स्वरूप में वापस लौटाया जाए।
  • जर्जर पड़े अंबेडकर मंगल भवनों को ठीक कराया जाए। वहां भगवान बुद्ध और डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित कराई जाए। ऐसे स्थानों पर हिंदू मंदिर बन गए हैं, तो वहां से प्रतिमा को सम्मान के साथ किसी हिंदू देवालय में स्थापित कराया जाए।
  • डॉ. अंबेडकर की प्रतिमाएं तोड़ने वालों और उनके प्रति अपमानजनक शब्द कहने वालों पर देशद्रोह का केस लगाया जाए।
  • बौद्ध विहारों को भी शासकीय भूमि दी जाए।

चुनावी साल में एक बार फिर मध्यप्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का मामला चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भोपाल में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में खुद को संकल्पित बताया। पीएम के बयान से साफ है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा UCC को मुद्दा बना सकती है। अगर प्रदेश में यूसीसी लागू होता है, तो 30 प्रतिशत आबादी पर इसका असर होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भोपाल में कहा- तीन तलाक से इस्लाम का कोई संबंध नहीं है। इसकी वकालत करने वाले वोट बैंक के भूखे हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड पर भड़का रहे हैं। एक घर दो कानूनों से नहीं चल सकता। यूनिफॉर्म सिविल कोड पर ‌‌BJP भ्रम दूर करेगी। बिहार में विपक्षी दलों की बैठक पर कहा- इन सभी दलों के घोटालों को मिला दिया जाए, तो 20 लाख करोड़ के घोटाले की गारंटी है। 

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