चाहें तो 3 दिन में हो सकता है नाम…भारत:कैबिनेट सचिव के नोटिफिकेशन से संभव, पर इसमें अड़चन; संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी

लोकमतसत्याग्रह/देश का नाम ‘भारत’ करने की चर्चा में बुधवार को एक और अध्याय तब जुड़ गया, जब सरकार ने जी-20 समिट के लिए जारी बुकलेट में भारत शब्द का इस्तेमाल किया। इसमें लिखा गया है: ‘भारत, द मदर ऑफ डेमोक्रेसी।’

इस बीच, कयास हैं कि केंद्र सरकार ऐसा कोई प्रस्ताव 19 को विशेष सत्र में ला सकती है। ऐसा होता है तो संविधान के अनुच्छेद 1 में संशोधन करना होगा। इस प्रक्रिया में कम से कम 3 दिन लग सकते हैं। एक-एक दिन लोकसभा-राज्यसभा में विधेयक पास कराने में और एक दिन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर में।

हालांकि कैबिनेट सचिव नोटिफिकेशन जारी कर राज्यों को निर्देश दे सकते हैं कि सरकारी काम में ‘भारत’ का इस्तेमाल करें। मगर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। इसलिए संविधान संशोधन ही उचित प्रक्रिया है।

वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैंबता रहे हैं एक्सपर्ट लॉ कमीशन के पूर्व चेयरमैन बीएस चौहान (रिटा. जस्टिस), पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी अचारी है

सवालयदि देश का नाम सिर्फ भारत रखना हो, तो प्रक्रिया क्या?
जवाब– कानून मंत्रालय संविधान संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार करेगा। केंद्र सरकार इसे संसद सत्र में पेश करेगी। लोकसभा में इसे स्वीकार करने या न करने पर बहस होगी। वोटिंग कराई जाएगी। दो तिहाई बहुमत मिलने के बाद बिल पास होगा। राज्यसभा में भी यही प्रक्रिया दोहराई जाएगी। इसके बाद इसे राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। राष्ट्रपति बिल पर हस्ताक्षर कर इसे स्वीकृत करेंगी। उसके बाद इसे भारत के गजट में प्रकाशित किया जाएगा। जिस दिन बिल गजट में प्रकाशित होगा, तभी से लागू माना जाएगा।

सवालसंशोधन के लिए जरूरी बहुमत है?
जवाब– लोकसभा में भाजपा के 301 सहित एनडीए के 332 सांसद हैं। कुल सांसद 543 हैं। 5 अन्य दलों के 56 सांसदों के सहयोग से दो तिहाई बहुमत (362 सांसद) संभव है। राज्यसभा के 245 सांसदों में एनडीए के 105 सांसद हैं। दो तिहाई बहुमत के लिए 164 सांसदों की दरकार है। पांच दलों के 27 सांसद सहयोग करें तो यह संख्या 132 होती है।

सवालराज्यसभा में पारित नहीं हुआ तो?
जवाब– संविधान संशोधन नहीं हो पाएगा। इसे लागू करने के लिए दोनों सदनों में पारित होना अनिवार्य है।

सवालऔर क्या बदलाव करने होंगे?
जवाब– उन सभी कानूनों में भी बदलाव होगा, जिनमें इंडिया शब्द है। हर सरकारी रिकाॅर्ड में यह बदलेगा।​​​​​​​

सवालइसरो, आईआईटी जैसे संस्थानों के नाम भी बदलने होंगे?
जवाब– ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। जरूरत भी नहीं है। मसलन, मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। मगर आज भी हाईकोर्ट का नाम मद्रास हाईकोर्ट है। बाॅम्बे का नाम मुंबई किया गया, मगर आज भी हाईकोर्ट का नाम बाॅम्बे हाईकोर्ट ही है।​​​​​​​

सवालसंस्थान नाम बदलना चाहें तो?‌
जवाब– संस्थान प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेजे। मंत्रालय नोटिफिकेशन जारी करेगा। राजस्व विभाग प्रक्रिया शुरू करेगा और नाम बदल जाएगा।

सवालनाम बदलने का क्या असर होगा?
जवाब– इसका दुनिया के अन्य देशों पर भी असर होगा। दुनियाभर में देश की पहचान रिपब्लिक ऑफ इंडिया से है। भारत ने विभिन्न देशों से कई तरह की संधियों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। सभी जगह इंडिया अंकित है। वहां भारत लिखवाना होगा। दुनियाभर में रह रहे देशवासियों के पासपोर्ट भी बदलेंगे। देश में भी प्रशासनिक स्तर पर कई जगह नाम बदलना होगा।

सवालराष्ट्रपति द्वारा जी-20 समूह के सदस्यों को भेजा गया आमंत्रण पत्र चर्चा में है। क्या ऐसा बदलाव संवैधानिक रूप से सही है?
जवाब– संविधान कहता है कि अंग्रेजी में पत्र है तो ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ या ‘प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया’ लिखा जाएगा। हिंदी में यह ‘भारत का राष्ट्रपति’ या ‘भारत का प्रधानमंत्री’ होना चाहिए। इसे ‘प्रेसिडेंट या प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत’ नहीं कर सकते।

सवालसुप्रीम कोर्ट ने फैसलों में क्या कहा था?
जवाब 2016 में तत्कालीन सीजेआई टीएस ठाकुर ने कहा था कि इंडिया और भारत दोनों को अलग-अलग नहीं माना जा सकता। दोनों एक ही हैं। किसी एक नाम को दबाकर दूसरे को संपूर्ण महत्व नहीं दिया जा सकता। जिसे इंडिया बोलना है वो इंडिया बोले और जिसे भारत बोलना है वह भारत बोले। ऐसी मांग पर 2020 में जस्टिस एसए बोबड़े ने भी कहा था कि संविधान में कहा गया है कि ‘इंडिया दैट इज भारत’ अर्थात ‘इंडिया जो भारत है।’ ऐसे में देश का नाम सिर्फ भारत रखे जाने की मांग सही नहीं है।

खर्च: 14 हजार करोड़ लागत संभव
नाम बदलने पर 14,304 करोड़ खर्च हो सकते है, जो देश के रेवेन्यु का 6% है। यह राशि खाद्य सुरक्षा के तहत 80 करोड़ लोगों को मिल रहे 1 माह के अनाज के खर्च के बराबर है।19 साल पहले: भाजपा विरोध में थी2004 में यूपी विधानसभा में सीएम मुलायम सिंह ने देश का नाम भारत करने का प्रस्ताव रखा था। यह पारित हो गया था। हालांकि भाजपा इससे पहले ही वॉकआउट कर गई थी।

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