लोकमतसत्याग्रह/कर्मचारियों का तनाव केवल उनकी कार्य क्षमता ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह पूरी कंपनी की बैलेंस शीट भी खराब कर रहा है। तनाव के कारण पूरे देश की अर्थव्यवस्था में भी गिरावट आती है। कर्मचारियों में तनाव के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हर साल अपनी जीडीपी का लगभग 1.6 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत को भी अपने कर्मचारियों में तनाव के कारण प्रतिवर्ष जीडीपी का लगभग एक प्रतिशत का नुकसान सहना पड़ता है। मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि जिस खतरनाक गति से कर्मचारियों में तनाव बढ़ रहा है, आने वाले समय में यह एक महामारी साबित हो सकता है और इससे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो सकता है।
कुल अमेरिकी कर्मचारियों का लगभग 22.8 प्रतिशत किसी न किसी मानसिक बीमारी से परेशान है और इस कारण कंपनियों को हर साल 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो रहा है। जबकि भारत में अभी कुल आबादी के लगभग दस प्रतिशत लोग ही मानसिक समस्या से पीड़ित हैं, इसके बाद भी भारत को हर साल लगभग 46 बिलियन डॉलर का नुकसान हर साल होता है।
मनोरोग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्मचारियों में आपस की राजनीति, वरिष्ठों का हर कर्मचारी के प्रति एक जैसा व्यवहार, कर्मचारियों को कंपनी के द्वारा दिए जा रहे टारगेट को कम करके अनावश्यक तनाव को कम किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे कंपनी की कुल उत्पादकता बढ़ जाती है। आधुनिक प्रबंधन तकनीक में दुनिया की सबसे टॉप कंपनियों में भी कर्मचारियों की संतुष्टि को सबसे ऊपर रखा जाता है जिसका असर उनकी बैलेंस शीट में दिखाई पड़ता है।
केवल 23 प्रतिशत को ही इलाज
मेडिक्स ग्लोबल की फाउंडर और सीईओ सिगल एट्ज़मों ने अमर उजाला से कहा कि अकेले भारत में लगभग 10 प्रतिशत लोग किसी न किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और निमहांस के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल मानसिक पीड़ितों में केवल 23 प्रतिशत को ही इलाज मिल पाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि लगभग 12 करोड़ मानसिक पीड़ित लोगों को इस गंभीर समस्या का कोई समाधान नहीं मिलता। इसका परिणाम कभी आत्महत्या, कभी सामूहिक हत्या और अक्सर तलाक और पारिवारिक समस्याओं के रूप में दिखाई पड़ता है।
इलाज न मिलने से मानसिक बीमारी बढ़ने और खतरनाक रूप लेने की संभावना बढ़ जाती है। स्वयं पीड़ित के अलावा परिवार के लोग भी अपने सदस्य को मानसिक बीमारी से पीड़ित बताने से बचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से लोग उन्हें पागल समझने लगेंगे। लेकिन उचित इलाज कर इस समस्या को किसी भी अन्य बीमारी की तरह पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
अनुमान से ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा तनाव
जेरी केयर हॉस्पिटल, चेन्नई के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. श्रीनिवास ने अमर उजाला से कहा कि हर साल किसी भी बीमारी के कारण व्यक्ति कुछ दिन अपना व्यावसायिक कार्य नहीं कर पाता है। इसकी गणना के आधार पर यह बताने की कोशिश की जाती है कि किसी बीमारी के कारण व्यक्ति या कंपनी की उत्पादकता में कितना अंतर आ सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे डिसेबिलिटी एडजस्टेड लाइफ इयर्स (DALYs) कहा जाता है। प्रसिद्ध पत्रिका लैंसेट ने सबसे पहले इसकी गणना प्रकाशित की थी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तनाव या मानसिक बीमारी के कारण उसकी कार्यक्षमता मेंं भारी गिरावट आ सकती है। सबसे ज्यादा दुखद बात यह है कि लगभग हर सातवें व्यक्ति के तनाव से पीड़ित होने के बाद भी इसमें से एक चौथाई को भी इलाज नहीं मिलता है। भारत में अभी इसका वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया है, लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि में एक प्रतिशत से काफी अधिक हो सकता है।
‘लाइफ स्टाइल नहीं, लाइफ को महत्त्व दें‘
सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक राजीव मेहता ने अमर उजाला से कहा कि हमें ‘लाइफ स्टाइल’ की बजाय ‘लाइफ’ पर ध्यान देना चाहिए। इसका यह अर्थ है कि ज्यादा पैसा कमा के भौतिक सुख-सुविधाओं को ज्यादा बढ़ाने की बजाय आत्मीय संतोष को प्राथमिकता देनी चाहिए। केवल इसी भावना को ध्यान में रखकर ही अनावश्यक तनाव और मनोरोगों से बचा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि कंपनियों के प्रबंधन की सामान्य सोच यह होती है कि कर्मचारी को ज्यादा टारगेट देकर वह ज्यादा लाभ कमा सकती है, लेकिन इसकी एक सीमा है। जैसे ही कर्मचारी की क्षमता से अधिक दबाव डाला जाता है, वह कुछ ही समय में तनाव का शिकार हो जाता है। अपना टारगेट पूरा करने के लिए वह ज्यादा समय तक काम करने की कोशिश करता है जिससे उसकी दूसरी चीजें भी नकारात्मक तौर पर प्रभावित होती हैं। अंततः इससे उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ता है और उत्पादन घट जाता है।
कैसे करें सुधार
कंपनी की उत्पादकता में सुधार के लिए आवश्यक है कि उसकी कार्य क्षमता के अनुसार काम दिया जाए। इसके साथ ही उसे पर्याप्त आराम, समय-समय पर पर्याप्त छुट्टी और उसे उत्साह में बनाए रखने के लिए सकारात्मक उत्प्रेरक (कंपनी टूर, इंसेंटिव या कोई रचनात्मक कार्य) उपयोग में लाया जाना चाहिए। योग, सही खानपान और कर्मचारियों के बीच राजनीति घटाकर कर्मचारियों की क्षमता में सुधार किया जा सकता है।


