लोकमतसत्याग्रह/इसे विडंबना कहें या समाज का दुर्भाग्य कि एक ओर हम जातीय अभिशाप से बाहर निकलने के लिए शनै-शनै आगे बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर सत्ता के लालच में एक ही झटके में दशकों पीछे धकेलने के कुत्सित प्रयास हो रहे हैं। जातिप्रथा समाप्त करने की दिशा में समाज ने पिछले 75 वर्षों में लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा की है। कुर्सी की चाह में डूबे दल और नेताओं को यह भान होना चाहिए कि जिस जाति की आग को भड़काकर वह राजनीति की रोटियां सेकना चाहते हैं उसे शांत करने में समाज के हर वर्ग और धर्म के समाज सुधारकों ने बड़ा त्याग किया है। कितना दुखद है जो जाति समस्या इतिहास की बात हो जानी चाहिए थी वह हर चुनाव में पहले से अधिक विकराल रूप में दिखाई देने लगी है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि जातियों के आधार पर चुनाव जीतना सबसे आसान है,और मुश्किल चुनाव कोई लड़ेगा इतनी शुचिता वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कहां देखने को मिलेगी।
. जाति आज टिकट वितरण से लेकर पार्टियों के वचन पत्र में सबसे प्राथमिकता शर्त बन गई है। हालही में भाजपा,कांग्रेस और बसपा ने अपने प्रत्याशियों की जो सूची जारी की है उसमें योग्यता नहीं बल्कि जाति समीकरण का स्पष्ट रूप से ध्यान में रखा गया है। काश यह कह पाता कि अपवाद स्वरूप यह एक या दो सीटों पर ही है। जातिगत राजनीति से सर्वाधिक प्रभावित ग्वालियर चंबल अंचल की सीटों पर तो प्रत्याशियों की घोषणा इसलिए एक दूसरे दल ने रोककर रखी जिससे सामने वाली पार्टी के प्रत्याशी की जाति के आधार पर खुद के प्रत्याशी का चुनाव किया जा सके। किसी ने भी इस राजनीतिक बुरी परंपरा से हटने की हिम्मत नहीं दिखाई। जातिगत मामलों को बढ़ावा देने के लिहाज से अबकी बार का चुनाव प्रदेश में हुए पिछले विधानसभा चुनावों से बहुत आगे है।
राजनीतिक दलों ने वचन पत्रों में जातिगत जनगणना कराने की घोषणा की है
इस बार तो एक राजनीतिक दल ने स्पष्ट रूप से लिखित में वचन पत्र घोषित किया है कि उनकी सरकार आने पर जातिगत जनगणना करवाई जाएगी। यानि जातियों की न सिर्फ गिनती की जाएगी बल्कि आंकड़ों को सार्वजनिक भी किया जाएगा। बता दें कि अंतिम बार जातिगत जनगणना के आंकड़े आजादी के पहले सन 1931 में जारी हुए थे। उसके बाद वर्ष 1941 में भी जनगणना हुई थी, परंतु आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जा सके। 1941 के बाद से अनुसूचित जाति और जनजाति की जनगणना होती है, लेकिन बाकी जातियों की अलग से जनगणना नहीं होती है। इस बात को स्वीकार करने में किसी को दिक्कत नहीं होगी कि किसी भी राज्य के पास समाज के हर वर्ग के स्पष्ट आंकड़े होना चाहिए जिनके आधार पर सामाजिक उत्थान के कार्यक्रम आरक्षण इत्यादी चलाए जाते हैं। यह सही है कि एक बेहतर आंकड़े ही बेहतर नीति निर्माण का आधार होता है। दुनिया के कई देश इस तरह की प्रक्रिया अपनाते भी हैं। जैसे यूएसए नस्लीय आधारित आंकड़ों को एकत्रित करता है, अंग्रेज अप्रवासियों की जानकारी एकत्रित करता है जिससे बेहतर नीति कायम की जा सके। देश में ओबीसी जातियों की गिनती की मांग इसी दायरे में है। लेकिन तर्क के बीच एक गौर करने वाली बात यह भी है कि आधुनिक राष्ट्र एवं राज्यों का सामाजिक ताना-बाना किस प्रकार प्रभावित होगा? और यह भी कि अंततः ये आंकड़े किस तरह उपयोग में लाए जाएंगे?
नागरिकों को चाहिए कि धर्म, जाति जैसी पहचान से दूर हो जाएं
वर्तमान की लोकतांत्रिक व्यवस्था एक ओर अपने नागरिकों से यह उम्मीद करता है कि वे सार्वजनिक जीवन में अपनी निजी पहचान जैसे जाति, धर्म एवं क्षेत्र आदि से दूर होते जाएं और ‘सार्वभौमिक नागरिक बोध’ के साथ हो लें, उधर दूसरी ओर उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग यानि राजनीतिक दल द्वारा जातिगत जनगणना को अपने वचन पत्र में शामिल करना हास्यास्पद स्थिति पैदा करती है। राजनीतिक दल भलीभांति जानते हैं कि जातिगत जनगणना नागरिकों को अपनी जाति के आधार पर समूहीकरण के लिये उकसाती है। यह न केवल राजनीतिक भागीदारी के प्रश्न को नागरिक बोध से खींच कर अस्मिता बोध की ओर ले आती है बल्कि इसी आधार पर जनकल्याण को परिभाषित करने की आकांक्षा भी रखती है। यह एक दिलचस्प विरोधाभास है, आधुनिक लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के अंतर्गत ही आधुनिकता के विरोध का विरोधाभास। इस बात को नहीं नकारा जा सकता है कि भारतीय समाज में मुख्यतः आर्थिक, शैक्षणिक एवं सामाजिक पिछड़ापन जाति से जुड़ा हुआ है, लेकिन आजादी के 75 सालों के प्रयास के बाद क्या इस बात पर गौर नहीं किया जाना चाहिए कि क्या यह पिछड़ापन अब केवल जाति से ही जुड़ा हुआ है? अगर राजनेता अपने फायदे के लिए जाति की राजनीति को चरमसीमा पर पहुंचाकर जाति जनगणना करा भी लेते हैं तो इसका असर सामाजिक तौर पर नाकारात्मक नहीं पड़ेगा इसकी क्या गारंटी है। जाति की असल संख्या और जनसंख्या दर्ज हो तो इससे क्या लाभ होगा? क्या सच में जातीय संख्या प्राप्त होने से विकास और नीति निर्माण को बल मिलेगा? प्रतीत तो ऐसा हो रहा है कि इस जनगणना के समर्थक नेता चाहते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानि पीडीएस जैसी कल्याणकारी योजनाओं को जातीय आधार पर विभाजित कर दिया जाए।
शैक्षणिक आरक्षण के वर्गीकरण को भी हिस्सों में विखंडित करना होगा
इससे तो शैक्षणिक आरक्षण के वर्गीकरण को भी हजारों हिस्सों में जाति के आधार विखंडित करना होगा। असल संख्या का अध्ययन करके क्या छात्रवृत्ति को भी कई हिस्सों में विभक्त करने की बात की जा रही है। यह दावा करके भ्रमित करने का ही प्रयास है कि जाति की संख्या जानकर हम समानता की राह पर आगे बढ़ेंगे, लेकिन क्या इस पर गंभीर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि इससे अन्तरजातीय प्रतिस्पर्धा और अंतहीन सामाजिक संघर्ष बढ़ेगा। जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसे नारों के बीच जातिगत जनगणना से परिवार नियोजन जैसे वृहद कार्यक्रम को धक्का लग सकता है। इससे देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ने का खतरा तो है ही जातिगत अस्मिताओं को बढ़ावा मिल सकता है जिससे समाज में द्वेष पैदा हो सकता है। अतः राजनीतिक दलों को चाहिए कि खुद के फायदे के लिए समाज का विघटन न करें। देश के दिल यानि प्रदेश में यूपी-बिहार जैसी जातीय कटवाहट नहीं बल्कि मेहनत से आगे बढ़कर खुद का उत्थान करने की परंपरा है। चुनाव आते जाते रहेंगे लेकिन भगवान के लिए पवित्र परंपरा में नफरत का जहर न घोलें।


