एमपी में मायावती ऐसे बिगाड़ेंगी सियासी समीकरण! कांग्रेस के लिए यहां सपा से बड़ी चुनौती है बसपा

लोकमतसत्याग्रह/मध्यप्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा के चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, सियासी तपिश भी बढ़ती जा रही है। वैसे तो सियासी समीकरणों के लिहाज से मध्यप्रदेश में सीधे तौर पर लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की हो रही है, लेकिन एक पार्टी और भी है जो इस वक्त मध्यप्रदेश की तीसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी भी है और अगर उस पार्टी का सही सियासी दांव चला तो मध्यप्रदेश में बड़े-बड़े सियासी समीकरणों की गणित बिगाड़ सकती है। आंकड़ों के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी में पिछले साल के चुनाव में तकरीबन 68 सीटों पर दूसरे और तीसरे नंबर पर उसके प्रत्याशी रहे थे। इस बार बहुजन समाज पार्टी ने मध्यप्रदेश की गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से गठबंधन कर आदिवासी और दलितों को साधने के साथ एक बड़े सियासी समीकरण को लेकर दांव चला है।

मध्यप्रदेश की सियासत में इस वक्त भाजपा और कांग्रेस के अलावा तीसरी जिस पार्टी की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह समाजवादी पार्टी है। लेकिन सियासी जानकारों का कहना है कि चर्चा भले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में सीटों के मिलने और न मिलने की हो। लेकिन असली खेल बनाने और बिगाड़ने में बहुजन समाज पार्टी का बहुत बड़ा रोल होने वाला है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार उमंग सक्सेना कहते हैं कि कांग्रेस ने अपना जो भी सियासी आकलन किया हो और उसी आकलन के बाद ही कांग्रेस के लिए कोई सीट भले न छोड़ी गई हो। लेकिन अभी भी असली खतरा कांग्रेस के लिए सपा से ज्यादा बहुजन समाज पार्टी बन सकती है। उमंग कहते हैं कि आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि पिछले चुनाव में अगर समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस का नुकसान किया तो बहुजन समाज पार्टी ने भी मजबूती के साथ न सिर्फ कांग्रेस का नुकसान किया, बल्कि कुछ सीटों पर ऐसे सियासी समीकरण बैठे की भाजपा का भी थोड़ा बहुत नुकसान हुआ।

उमंग कहते हैं कि मध्यप्रदेश की तकरीबन 68 सीटें ऐसी थीं, जहां पर बहुजन समाज पार्टी 2018 के चुनाव में दूसरे या तीसरे नंबर पर रही थी। इनमें कई सीटें तो ऐसी थीं जो की बहुजन समाज पार्टी के चलते ही कांग्रेस के हाथ से खुले तौर पर फिसल गई। मध्यप्रदेश चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि यहां की अटेर विधानसभा सीट में कांग्रेस तकरीबन 5000 वोटो से चुनाव हार गई थी। इसी सीट पर बहुजन समाज पार्टी को 16 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। इसी तरह मध्यप्रदेश की कोलारस सीट पर कांग्रेस महज 720 वोटों से चुनाव हार गई। जबकि बहुजन समाज पार्टी को इसी सीट पर 16 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। मध्यप्रदेश के ही बीना में कांग्रेस 632 वोटों से चुनाव हारी थी। जबकि इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने तकरीबन 7000 वोट पाकर कांग्रेस का सियासी समीकरण बिगाड़ दिया था। आंकड़े बताते हैं कि टीकमगढ़ में कांग्रेस 4175 वोटो से हारी थी। जबकि इसी सीट पर बहुजन समाज पार्टी को तकरीबन 10 हजार वोट मिले थे।

सियासी जानकारों का कहना है कि सिर्फ बहुजन समाज पार्टी ही नहीं, बल्कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) ने भी कुछ सीटों पर पिछले चुनाव में सियासी समीकरण बिगाड़ दिए थे। एमपी चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि यहां की टिमरनी विधानसभा में भी कांग्रेस 2213 वोटों से हारी थी। जबकि इसी सीट पर जीपीपी को साढ़े पांच हजार से ज्यादा वोट मिले थे। मध्यप्रदेश की बिजजपुर में कांग्रेस 2840 वोटों से हार गई थी। जबकि इसी विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी को 37000 से ज्यादा वोट मिले थे। राजनैतिक विश्लेषक वैभव पवार कहते हैं कि मध्यप्रदेश में इस वक्त सियासत में कांग्रेस और भाजपा की तो चर्चा हो ही रही है। क्योंकि इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच में चुनाव की असली लड़ाई है। लेकिन बीच-बीच में समाजवादी पार्टी की सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। वैभव कहते हैं कि चर्चा भले समाजवादी पार्टी की ज्यादा हो, लेकिन तीसरे नंबर की सबसे बड़ी और साइलेंट पार्टी के तौर पर बहुजन समाज पार्टी मध्यप्रदेश में अपनी सियासी दांव पेंच के साथ बढ़ चुकी है।

उनका कहना है कि बहुजन समाज पार्टी की मध्यप्रदेश में कोई बहुत बड़ी हैसियत नहीं है। लेकिन जितनी चर्चा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को लेकर के हो रही है, उसकी तुलना में तो कई गुना ज्यादा हैसियत मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की है। और वह कई सीटों पर कांग्रेस का खेल बिगाड़ने की स्थिति में भी है। सियासी जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस को इसका अंदाजा नहीं है। लेकिन सियासत में हर कदम फूंक फूंक कर रखे जाते हैं, शायद यही वजह है कि कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के हुए गठबंधन पर चुप्पी जरूर साधे है। लेकिन अंदरूनी तौर पर जबरदस्त मंथन भी चल रहा है। वह कहते हैं कि अगर सियासी ताकत का अंदाजा वोट प्रतिशत से लगाना हो, तो बहुजन समाज पार्टी एमपी में समाजवादी पार्टी की तुलना में बहुत आगे है। मध्यप्रदेश के चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी को 2018 में 5.1 फीसदी मत मिले थे। जबकि समाजवादी पार्टी को 2018 में 1.30 प्रतिशत ही वोट मिले थे।

वैभव पवार कहते हैं कि समाजवादी पार्टी से ज्यादा वोट प्रतिशत तो मध्यप्रदेश में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को मिले थे। आंकड़ों के मुताबिक 2018 के चुनाव में जीजीपी का वोट प्रतिशत समाजवादी पार्टी से ज्यादा था। समाजवादी पार्टी को जहां 1.30 फ़ीसदी वोट मिले थे। वहीं जीजीपी को 1.78 फीसदी वोट मिले थे। सियासी जानकारों का कहना है कि भले ही 2008 के बाद बहुजन समाज पार्टी का वोट प्रतिशत कम हुआ हो और उसके विधायक भी कम हुए हों। लेकिन प्रदेश के सियासी समीकरण को बिगाड़ने और बनाने की हैसियत में बहुजन समाज पार्टी इस बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के गठबंधन के साथ तो सियासी मैदान में उतर ही चुकी है। मध्यप्रदेश चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी को 2008 में जहां 8.9 फीसदी वोट के साथ सात विधानसभा सीटें मिली थीं। 2013 में बसपा का वोट प्रतिशत खिसककर 6.29 हो गया और सीटें 7 से 4 रह गई थीं। जबकि पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का वोट प्रतिशत 2013 की तुलना में खिसक कर 5.01 रह गया और सीटें भी खिसक कर चार से दो पर आ गईं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मायावती ने इस बार दलित और आदिवासियों के सहारे मध्य प्रदेश में अपनी सियासी पैठ को मजबूत करने के लिए जीजीपी से गठबंधन किया है। गठबंधन के चलते मायावती मध्यप्रदेश की 178 सीटों पर सियासी मैदान में ताल ठोंक रही हैं, जबकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के हिस्से में 52 सीटें आई हैं। राजनीति विश्लेषक पवार कहते हैं कि जिस तरीके से 2018 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी और जीजीपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ने के बाद भी कई सीटों पर सियासी समीकरण न सिर्फ बिगाड़े थे बल्कि कांग्रेस का अच्छा खासा नुकसान किया था। इस बार दोनों पार्टियों के गठबंधन के साथ मध्य प्रदेश की सियासत में सियासी समीकरणों को बनाने और बिगाड़ने के लिहाज से यह गठबंधन सबसे बड़ा और ‘साइलेंट गठबंधन’ माना जा रहा है।

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