लोकमतसत्याग्रह/याद कीजिए आज से 15-20 साल पहले जब ग्वालियर और चंबल अंचल में कोई भी चुनाव होते थे तो वोटिंग का दिन आते-आते कितनी डराने वाले समाचार हम तक पहुंचने लगते थे। हिंसा, बूथ कैप्चरिंग, मतदान दल पर हमला से लेकर आमने-सामने की गोलीबारी में लोगों की मौत होना आम बात होती थी। उस डर के माहौल में लोकतंत्र की अहम कड़ी यानि मतदाता घर में दुबका रहना ही पसंद करता था। यही कारण है कि सिर्फ तीन विधानसभा चुनाव पीछे जाएं तो पाएंगे कि आधे लोग भी बमुश्किल मतदान केंद्र तक अपना वोट डालने के लिए जाने की हिम्मत जुटा पाते थे।महिलाओं की स्थिति तो और भी निराशाजनक थी। पुरुषों की तुलना में करीब 11 फीसदी तक कम वोट महिलाओं द्वारा डाले जाते थे। चुनाव आयोग के ही आंकड़े हकीकत उजाकर करते हैं। 2008 में अंचल के जिलों में पुरुषों ने यदि औसतन 55 फीसदी मतदान किया था तो सिर्फ 44 फीसदी महिलाएं ही वोट डालने गईं थीं। यानि सरकार चुनने के प्रति निराशाजनक भाव की प्रतिस्पर्धा देखने मिलती थी। लेकिन समय से साथ अंचल ने भी लोकतंत्र के उत्सव के दौरान अपनी उग्र और निराशाजनक छवि को पीछे छोड़ दिया है। जिम्मेदार नागरिकों के जैसे इस बार हमने रिकार्ड मतदान किया, 2008 की तुलना में तो यह 12 फीसदी से अधिक है। सोने पर सुहागा यह कि महिला और पुरुषों के बीच मतदान प्रतिशत की जो 11 प्रतिशत की गहरी खाई थी वह भी अब न-मात्र की बची है। इसका आशय है कि अब यहां के घरों में महिलाओं की राय को भी तबज्जो मिलती है। महलगांव, थाटीपुर से लेकर मुरार और भिंड, मुरैना के ग्रामीण क्षेत्रों में भी मतदान केंद्रों पर बराबरी से लगीं पुरुष और महिलाओं की कतारें बता रहीं थी कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश द्वारा बनाई चुनावी प्रक्रिया में हमारी आस्था की जड़ें हर पंचवर्षीय के साथ कितनी गहरी होती जा रही हैं। छुटपुट घटनाओं छोड़ दें तो कोई भी बड़ा अपराध इस चुनावी प्रक्रिया के दौरान देखने को नहीं मिला। यह शुभ संकेत है एक सभ्य और संतुलित समाज का।


