रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से खुश हैं कार सेवक, बोले- हमारा समर्पण व्यर्थ नहीं गया

लोकमतसत्याग्रह/राम जन्म भूमि आंदोलन से जुड़े मोहन गंभीर सिंह कौरव ने कहा आखिर वह समय आ गया, जिसका हमें बेसब्री से इंतजार था। मैं उस दौरान अपने साथ दो ईंट भी लाया था जो आज भी रखी हैं। वहीं मोहन विट्वेकर का कहना है कि रामलला के प्राण प्रतिष्ठा का समय नजदीक आने से बहुत खुश हूं। रामजन्म भूमि मुक्ति आंदोलन में शामिल होने हम कारसेवकों ने काफी कुछ सहा। लाठियां खाई, अश्रु गैस झेली और जेल में भी बंद रहे। हमारा समर्पण व्यर्थ नहीं गया। इस बात की खुशी अब जाकर मिली है।

दूसरी बार में पहुंच पाया अयोध्या, पहली बार में लौटना पड़ा

राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का स्मरण करते हुए गंभीर सिंह ने बताया कि 1990 में मैं पहली बार अयोध्या गया, बीच रास्ते में वहां लोगों को प्रताणित करने का संदेश मिला, तो वापस लौट आया, लेकिन लक्ष्य था अयोध्या पहुंचकर आंदोलन में शामिल होना। दूसरी बार मैं दिसंबर 1992 में फिर गया। हमारे साथ और भी कारसेवक थे। छह दिसंबर को मैं विवादित ढांचे के करीब था, जहां साध्वी ऋतम्भरा लोगों को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने संबोधन में ललकार लगाई तो इसके बाद कारसेवकों ने विवादित ढांचे को तोड़ दिया। वहां के मंदिर की दो ईंट बैग में रखकर मैं ग्वालियर ले आया। इसके बाद हमें फोन पर धमकाया गया कि निपटा दिया जाएगा। इस धमकी का हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा।

मेरी मृत्यु की हवा फैल गई थी शहर में

जब मैं आंदोलन में अयोध्या गया हुआ था, उस समय किसी ने यह हवा फैला दी की मैं अब नहीं रहा यानी मेरी मृत्यु हो गई। इस पर घर के सभी लोग बहुत परेशान हो गए। तब स्वर्गीय बसंत राव विटवेकर मेरे घर पर पहुंचे। उनके साथ मोहन विटवेकर, मनोज शास्त्री, स्वर्गीय मनीराम ठाकुर, दासु नरवरिया भी थे।

-गम्भीर सिंह कौरव।

15 दिन जंगलों में रहे, फिर संघ की योजना से पहुंचे आयोध्या

500 वर्षों से पुरखों के लगातार संघर्ष से प्रेरणा लेकर वर्ष 1990 में स्वयं अयोध्या आंदोलन में समर्पित करने का मन बनाया। इसलिए संघ कार्यालय में संम्पर्क किया, तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने घोषणा की थी कि कोई कार सेवक तो क्या, अयोध्या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। हमने निश्चय किया कि संघ की योजना से गुप्त वाहिनी से अयोध्या पहुंचेंगे। मेरे साथ मुरारीलाल शर्मा, गम्भीर सिंह कौरव, राजेश शर्मा, चंदू तोमर, मनोज शास्त्री सहित 12 लोग झांसी से चुपचाप ट्रेन से लखनऊ पहुंचे। यहां से आगे के रास्ते व वाहन सरकार ने बंद कर दिए थे। यहां से किसी तरह छिपते हुए फैजाबाद के गांवों से होते हुए अयोध्या के पास पहुंच गए। 15 दिन जंगल के गावों में पड़े रहे, फिर संघ की योजना से जंगल में चलते हुए हजारों गुप्त कारसेवकों के साथ अयोध्या परिक्रमा मार्ग पहुंच गए। यहां बड़ी संख्या में पुलिस ने घेरकर हम पर लाठी चार्ज किया और अश्रु गैस छोड़ी और अंत में 50 हजार कारसेवकों को खदेड़ने के लिए गोलियां चला दीं। भगदड़ में हम बिछड़ गए।

हमें खापरहिद की जेल में बंद कर दिया गया

पुलिस मुझे व कुछ साथियों को खापरहिद की जेल में बंद कर दिया। मुझे समझ आया कि गम्भीर सिंह, मुरारीलाल हमारे साथ नहीं हैं। जेल तोड़कर हम दोबारा इन्हें ढूंढने अयोध्या पहुंचे। वहां संघ की योजना से हमें फिलहाल वापस लौटने को कहा, साथ बचे साथियों के साथ कई किलोमीटर पैदल चलकर मुश्किल से ग्वालियर पहुंचे। यहां दूसरा झटका लगा।गम्भीर सिंह और मुरारीलाल घर नहीं पहुंचे थे। अयोध्या से बड़े हादसों की खबर आ रही थी। गम्भीर सिंह के छोटे भाई जगत सिंह कौरव जो उस समय हमारे पड़ोसी थे व इस घटना के दौरान मेरे पिताजी स्वर्गीय वसंत राव विट्वेकर की सरपरस्ती में थे। हम व पिताजी जगत के घर ढांढस बंधाने गए। यह बड़ा विकट समय था। भाग्य से सभी बिछड़े साथी कुछ समय में थोड़े बहुत चोटिल होकर लौट आए। 1992 में हमने फ़िर एक बार अयोध्या कूच किया। यह खुला अभियान था, जिसमें गुलामी का प्रतीक विवादित ढांचा ढहा दिया गया।

मोहन विट्वेकर।

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