लोकमतसत्याग्रह/पश्चिम बंगाल में कंचनजंगा एक्सप्रेस के साथ हुए हादसे के बाद रेलवे बोर्ड ने वंदे भारत और गतिमान एक्सप्रेस की अधिकतम गति सीमा को 160 से घटाकर 130 किमी प्रतिघंटा कर दी है। नई दिल्ली से झांसी के रूट पर ट्रेनों की टक्कर को रोकने के लिए स्वदेशी तकनीक कवच लगाने की तैयारी की जा रही है। जब तक कवच का काम पूरा नहीं होता है,
पश्चिम बंगाल में कंचनजंगा एक्सप्रेस के साथ हुए हादसे के बाद रेलवे बोर्ड ने वंदे भारत और गतिमान एक्सप्रेस की अधिकतम गति सीमा को 160 से घटाकर 130 किमी प्रतिघंटा कर दी है। नई दिल्ली से झांसी के रूट पर ट्रेनों की टक्कर को रोकने के लिए स्वदेशी तकनीक कवच लगाने की तैयारी की जा रही है। जब तक कवच का काम पूरा नहीं होता है, तब तक ट्रेनों की गति को कम ही रखा जाएगा।
इसमें शताब्दी एक्सप्रेस को शामिल करने की भी सिफारिश की गई है। इन ट्रेनों की गति को भले ही कम कर दिया गया है, लेकिन इससे इस रूट पर अन्य ट्रेनों के समय में कोई बदलाव नहीं करना पड़ेगा। रेलवे बोर्ड ने इन ट्रेनों की गति कम करने के बाद परीक्षण कर यह निर्णय लिया है। वंदे भारत, गतिमान, शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम, लक्जरी और हाइ स्पीड ट्रेनों की गति दिल्ली से लेकर भोपाल के बीच ट्रैक पर औसतन 130 किमी प्रतिघंटा ही रहती है।
सिर्फ दिल्ली से लेकर आगरा के बीच के रेलखंड में ट्रैक पर कम मोड़ व घुमाव होने के कारण 160 किमी प्रतिघंटा तक की रफ्तार हासिल हो जाती है। यही वो रेलखंड है, जहां दिल्ली से लेकर आगरा के बीच की 187 किमी की दूरी तय करने में ट्रेन को 1:36 से लेकर 1:40 घंटे का समय लगता है। यहां मथुरा के पास ट्रैक में घुमाव होने के कारण ट्रेन की गति कम की जाती है।
इसके बाद आगरा से लेकर ग्वालियर तक के 118 किमी का सफर यह ट्रेन 1:12 घंटे में पूरा करती है यानी ट्रेन की रफ्तार कम हो जाती है। यही स्थिति आगे के स्टेशनों के लिए भी रहती है। रेलवे बोर्ड ने जब ट्रेनों की गति कम करने का निर्णय लिया, तो यह सवाल खड़े हुए कि गति कम होने से अन्य ट्रेनों के संचालन पर फर्क पड़ेगा। ऐसे में शुरूआत में ट्रेनों के संचालन पर बारीक नजर रखी गई। इसके बाद फैसला लिया गया है कि अन्य ट्रेनों के समय में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
दिल्ली से बीना तक होगा कवच का काम
कवच एक स्वचलित ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम है। इस पर रेलवे ने वर्ष 2012 में काम करना शुरू किया था। कवच तकनीक ट्रेनों की आपस में भिड़ंत को रोकने का काम करती है। इस तकनीक में सिग् ल जंप करने पर ट्रेन खुद ही रुक जाती है। कवच प्रणाली में हाई फ्रिक्वेंसी के रेडियो कम्युनिकेशन का इस्तेमाल किया जाता है। ये सिस्टम आमने-सामने और एक ही ट्रैक पर पीछे से ट्रेनों की भिड़ंत रोकने का काम करता है। ब्रेक फेल होने की स्थिति में कवच ब्रेक के आटोमेटिक उपयोग से ट्रेन की गति को नियंत्रित करता है। यह सिग्नल से जुड़ा होता है और इंजन में मौजूद आन बोर्ड डिस्प्ले आफ सिग्नल एस्पेक्ट सिस्टम से लोको पायलट का अलर्ट मिलता रहता है।
दिल्ली से बीना तक होगा कवच का काम
बंगाल में हुई घटना के बाद उत्तर मध्य रेलवे प्रयागराज मुख्यालय ने ही रेलवे बोर्ड से सिफारिश की थी कि जब तक रेल ट्रैक पर टक्कररोधी स्वदेशी तकनीक कवच का काम नहीं हो जाता है, तब तक ट्रेनों की गति को कम रखा जाए। अब ट्रेनों की गति कम होने के बाद दिल्ली के बीना के बीच कवच के काम का सर्वे शुरू करा दिया गया है। रेलवे अधिकारियों की मानें, तो इस काम को बोर्ड से स्वीकृति मिल चुकी है लेकिन इसमें भारी-भरकम राशि खर्च होती है। इसके अलावा ट्रैक के बगल में उपकरण लगाने के साथ ही सिग्नलिंग और इंजन में भी उपकरण लगाए जाते हैं। इसमें कितना समय लगेगा, यह बताना अभी मुश्किल है लेकिन काम जल्द ही शुरू हो जाएगा।
गति कम नहीं करनी पड़ेगी
वंदे भारत और गतिमान एक्सप्रेस की गति को 160 से घटाकर 130 कर दिया गया है। गति कम करने से इन ट्रेनों सहित अन्य गाड़ियों के समय पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसका परीक्षण करा लिया गया है। वहीं धौलपुर–बीना रेलखंड में कवच प्रणाली का सर्वे शुरू कर दिया गया है। यह कार्य पहले से स्वीकृत है, जल्द ही इसका काम शुरू हो जाएगा।
हिमांशु शेखर उपाध्याय, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, उत्तर मध्य रेलवे प्रयागराज


