सीमा पर तैनात सैनिक को भी अपनी लोकेशन पता रहेगी, कैंप में कमांडर को भी होगी जानकारी

लोकमतसत्याग्रह/सेना और सुरक्षा बलों के पास संचार के लिए रेडियो सेट होते हैं, लेकिन इनके पास अब तक विजुअल डेटा के लिए कोई सिस्टम नहीं है। सेना सुविधा के लिए शहर के नवल जैन ने एक टेक्निकल विजुअल वायरलेस डाटा कार्ड डिवाइस तैयार की है। साथ ही आर्मी के रेडियो सेट में एक हार्डवेयर अटैच किया है, जिसमें वीडियो व फोटो कैप्चर किया जा सकता है।

यह जीपीएस लोकेशन भी बताता है। इसके माध्यम से सीमा पर तैनात सैनिक को भी अपनी लोकेशन पता रहेगी, साथ ही कैंप में कमांडर को भी उनकी जानकारी होगी। इसकी खास बात यह है कि इसे बिना इंटरनेट के यूज किया जाता है। यह रेडियो फ्रिक्वेंसी के माध्यम से फोटो और लोकेशन भेजने में सक्षम है।

अभी इस डिवाइस का भारतीय सेना द्वारा 100 से अधिक इकाइयों का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा आईटीबीपी ने भी डिवाइस की मांग की हैं, जिसकी प्रक्रिया चल रही है। साथ ही बीएसएफ, एनडीआरएफ ने सराहना की है।

छह महीने में बनाया पहला प्रोटोटाइप, सेना के अधिकारियों ने किया पास

नवल ने बताया कि कि इंदौर से इंजीनियरिंग करने के साथ ही वे महू मिलिट्री कालेज आफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग कालेज में टेक्नीकल सपोर्ट का काम रहे थे। इस दौरान सेना की इस समस्या का पता चला तो अधिकारियों को हल सुझाया। इसके बाद छह महीने में पहला प्रोटोटाइप बनाया।

सेना के उच्च अधिकारियों ने उस प्रोटोटाइप को उपयोगी पाया, जिसके बाद दूसरी यूनिट में जाने लिए अनुमति दी गई, कई स्तरों पर इसकी जांच करके उत्तीर्ण किया गया जिसके बारे में सुरक्षा कारणों से ज्यादा जानकारी साझा नहीं कर सकते। इसके बाद सेना के साथ मैदानी काम शुरू किया।

1.5 साल की रिसर्च के बाद छोटा सा प्रोटोटाइप फाइनल बनाया और बाद में इसकी मांग आर्मी में ही इतनी ज्यादा बढ़ी की स्टार्टअप स्टराब्रू टेक सिस्टम शुरु कर दिया। प्रोडक्ट को बाद में पेटेंट भी मिला।

बिना इंटरनेट के काम करेगा डिवाइस

नवल ने बताया कि यह स्टार्टअप इंडिया में रजिस्टर है और आइडिया तीन से चार साल पुराना है। यह निर्मित प्रोडक्ट बिना इंटरनेट, बिना सिम के भी पूरे व्हाट्सएप का फंक्शन चला देता है, जो आर्मी, फारेस्ट, बार्डर, पुलिस बलों के लिए उपयोगी है। कमर्शियल आर्मी में स्वीकार होने के लिए बहुत सी परेशानियों से गुजरना पड़ा। कंपनी का क्रेडिट आर्मी में सामान सप्लाई के लिए काफी नहीं था, जिसमें काफी समय लगा।

स्टार्टअप में आया आठ लाख का खर्च

नवल ने बताया कि डेढ़ वर्ष के रिसर्च के बाद इसे तैयार किया गया। प्रोडक्ट को पूरा संचालित और सप्लाई करने की स्थिति तक लाने में, और इसे बनाने में लगभग 8 लाख का खर्च आया।

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