भगवान आपको बहुत चाहते हैं , और आप बिलकुल नहीं :आचार्य ब्रजपाल शुक्ल , वृंदावनधाम

लोकमत सत्याग्रह/नीरज वैधराज /सागर / मध्य प्रदेश

आपने देखा होगा कि यदि बच्चा खेलते खेलते गिर जाता है तो माँ दौड़ कर उसे उठाकर , छाती से लगा लेती है । उसकी धूल साफ कर देती है , और कहती है , कुछ नहीं हुआ , उठ जाओ , हमारा भैया राजा रोता नहीं है । ऐसे ऐसे दृश्य माँ और बेटे के बीच आपको अपने घर में ही देखने को मिलते हैं । बच्चा तो बड़ा हो जाता है , उसके बाल बच्चे भी हो जाते हैं लेकिन माँ कभी बड़ी नहीं होती है । वह उतनी ही रहती है । वह आपके दुख में सौ गुना हमेशा दुखी होती है । ठीक यही स्थिति भगवान की है । वह आपको रंचमात्र भी दुखी नहीं देखना चाहते हैं ।

भागवत के 12 वें स्कन्ध के 12 वें अध्याय के 47 वें श्लोक में सूत जी ने शौनकादि ऋषियों से कहा कि —

पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशो ब्रुवन् ।
हरये नमः इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ।।

सूत जी ने कहा कि हे शौनकादि ऋषियो ! भगवान की जीवों के प्रति ममता तो देखो कि यदि कोई स्त्री पुरुष नपुंसक कोई भी अपनी ही गलती से ऊपर से गिरते हुए , या कुआ नदी आदि में गिरते हुए धोखे में भी जोर से ” हरये नमः ” हे हरी आपको नमस्कार है ” ऐसा कह कर चिल्ला पड़ता है तो भगवान उसे सभी पापों से मुक्त कर देते हैं । भगवान को लगता है कि यह जिस पाप के कारण गिरा है , उस पाप को ही नष्ट कर देता हूं , ताकि वह दुबारा फिर कभी किसी पाप के कारण कहीं भयानक जगह में न गिर जाए कि वहां कोई बचानेवाला न हो । भगवान आपको दुखी देखना नहीं चाहते हैं ।

★स्खलितः★
यदि कोई सीढ़ी आदि से ऊपर चढ़ते हुए या पानी आदि में फिसलकर गिरते हुए भगवान का नाम जोर से बोल देता है तो भगवान उसके पापों को नष्ट कर देते हैं । भले वह अपनी असावधानी के कारण फिसला हो , लेकिन भगवान को तो लगता है कि निश्चित ही किसी पाप के कारण गिरा होगा , यही सोचकर वे पापों को नष्ट कर देते हैं ।

★आर्तः ★

यदि कोई रोग से पीड़ित होकर भगवान के नामों का उच्चारण करता है , तो भगवान विचारने लगते हैं कि पता नहीं किस पाप के कारण यह रोगी हो गया है , ऐसा सोचकर उसके पापों का नाश कर देते हैं ।
★क्षुत्त्वा ★
यदि कोई बहुत भूखा हो , उसे भोजन ही न मिल रहा हो , और भगवान के किसी भी नाम को लेकर कहने लगे कि हे हरे , हे नारायण ! मुझे बहुत भूख लगी है तो भगवान सबसे पहले उसके पापों को नष्ट करते हैं , क्यों कि उन्हें लगता है कि चारों तरफ तो भोजन ही भोजन है लेकिन यह क्यों भूखा है ? हो सकता है कि इसका कोई पाप होगा , यह विचार कर उसके पाप नष्ट कर देते हैं ।अर्थात दुर्भाग्य ही नष्ट कर देते हैं ।

★विवशः ★

यदि कोई विवश होकर भी गुरू के कहने पर या माता पिता या किसी मित्र आदि के कहने पर , बिना इच्छा के ही जोर जोर भगवान का नाम लेता है तो भी भगवान उसके सभी प्रकार के पापों का नाश कर देते हैं । भगवान विचार करने लगते हैं कि इसके मुंह से मेरा नाम क्यों नहीं निकलता है । मेरा नाम लेने की इच्छा क्यों नहीं इसकी होती है । निश्चित ही कोई न कोई इसका पाप ही इसको रोक रहा है , ऐसा सोचकर भगवान उसके पापों को नष्ट कर देते हैं ।

अब इस श्लोक का एक साथ अर्थ देखिए ।

जो भी स्त्री पुरुष जीव जंतु गिरते हुए , फिसलते हुए , भूख से तड़पते हुए , अथवा बेबशी में भी ” हरये नमः ” हे हरी आपको नमस्कार है ” ऐसा जोर जोर से चिल्लाकर नाम लेता है , वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है ।

अब आप ही सोचिए कि जैसे आप जब भी दुखी होते हैं तो अपने मन में यही सोचने लगते हैं कि पता नहीं किस जन्म का पाप भोग रहे हैं । आप बिचार भी नहीं करते हैं कि क्या गलती हो गई है ? सभी दुखों में पाप ही कारण नहीं होता है , गलती भी कारण होती है , लेकिन आपको दुख में पाप का ही बिचार आता है ।

जैसा आप सोचते हैं., ठीक वैसा ही आपके दुखी होने पर भगवान भी सोचने लगते हैं कि दुख का कारण तो पाप ही होता है । वे आपकी गलती का बिचार नहीं करते हैं कि चलते चलते फिसलने में गलती होती है , इसमें पाप का क्या लेना देना है ?भूख तो लगती ही है ।

कोई काम नहीं करेगा तो भोजन कैसे मिलेगा ? इसका मतलब है कि यह कुछ काम नहीं करता है , इसलिए भूखा मर रहा है । इतनी सी बात में पाप के विषय में क्यों सोचें ? लेकिन ममता के कारण भगवान को आपकी गलती नहीं दिखती है । वे एक साधारण अज्ञानी मनुष्य की तरह गिरने पड़ने पर ,भूख लगने पर ,बीमार होने में भी यही सोचते हैं कि लगता है कि इसका कोई पाप ही होगा ?

ऐसा तो एक माँ ही सोच सकती है कि मेरे बच्चे को जो भी हो रहा है , वह कोई और कारण है । इसमें मेरे बच्चे की कोई गलती नहीं है । बच्चे को नहीं कहेगी कि तुम सीढ़ी पर क्यों चढ़ गए थे , बल्कि बच्चे को रोते हुए देखकर रखनेवाले से ही नाराज होती है कि हजार बार कहा है कि यहां सीढ़ी न रखा करो ।

ऐसे ही भगवान भी आप लोगों की असावधानी पर गलती पर ध्यान नहीं देते हैं., बल्कि गिरने , फिसलने जैसी छोटी छोटी घटनाओं से दुखी होकर नाम लेकर पुकारनेवाले के पापों का ध्यान करके पापों को नष्ट करने लगते हैं ।

आपको कभी तो सोचना चाहिए कि भगवान का नाम लेने से दुख क्यों दूर हो जाते हैं ? अरे भैया ! भगवान आपको अतिप्रेम करते हैं , बहुत स्नेह करते हैं । वे तो माँ की तरह ही हैं । आपको दुखी नहीं देख सकते हैं । लेकिन आप तो बेईमान , बेशरम हो गए हैं ।

जैसे शादी होने पर आप अपनी माँ की ममता की कद्र नहीं करते हैं । पत्नी बनने पर पति के प्रेम को चाहते हैं और पति बनने पर पत्नी के प्रेम को चाहते हैं । माँ के प्रेम की आपको जरूरत नहीं लगती है । इसी प्रकार माया के प्रेम में पागल हो गए हैं , माया से प्रेम की भीख मांगते हुए मर जाएंगे , प्रेम नहीं मिलेगा । अपमान तिरस्कार ही मिलेगा । लेकिन जिसने तुम्हें जन्म से मृत्यु तक माँ जैसा ही हृदय से प्रेम रखा है । एकबार के नाम लेने से आपकी ओर दौड़ पड़े , उसका नाम लो ,उसकी मानो , उसकी भी सुनो । उससे बड़ी दयालु माया नहीं है ।

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