भितरवार मैं स्थानीय कलाकारों द्वारा किया जा रहा है रामलीला का सुंदर मंचन

95 वी रामलीला देखने उमड़ पड़ा नगर ,भगवान श्रीराम ने तोड़ा धनुष

बाणासुर संवाद, धनुष भंजन, परशुराम संवाद,और राम विवाह की लीला का हुआ मंचन

भितरवार-जनकपुरी में आयोजित सीता स्वयंवर में जब रावण शिव धनुष उठाने के लिए बढ़ा,लेकिन बाणासुर के समझाने के बाद वह गुरु धनुष को प्रणाम कर वापस लौट गया। उधर सीता स्वयंवर में शामिल होने मिथला पहुंचे रथी महारथी जब शिव धनुष को हिला नहीं सके तो राजा जनक बेहद निराश हो गए। वह कहते हैं कि लगता है कि पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है। इस पर लक्ष्मण क्रोधित हो उठते हैं। तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर भगवान राम शिव धनुष का भंजन करते हैं। इसके बाद सीता राम एक दूसरे के गले में वरमाला डालते हैं।यह दृश्य था जनता श्रीकृष्ण कला पथक मंडल के तत्वावधान में रामलीला मैदान में चल रही रामलीला में सीता स्वयंवर का मंचन हुआ। इसके पूर्व मिथला में आयोजित स्वयंवर में राजा जनक घोषणा करते हैं कि जो शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसी से सीता का विवाह होगा। रावण भी इस स्वयंवर में आता है और उसका वाणासुर के साथ संवाद होता है।जनकपुरी में आयोजित धनुष यज्ञ में विभिन्न देशों के राजा भी शामिल थे।धनुष तोड़ने के लिए बड़े बड़े राजाओं ने जोर आजमाया लेकिन धनुष तोड़ने की तो दूर कोई उसे हिला तक न सका।राजा जनक ने कहा लगता है कि पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है। राजा जनक की बात सुनकर लक्ष्मण क्रोधित होकर बोले कि ऐसे धनुष को उठा कर वह कोसों दूर फेंक सकते हैं।उन्होंने श्री राम से आज्ञा देने का अनुरोध किया। विश्वामित्र लक्ष्मण को शांत होने को कहते हैं। तब राजा जनक ने कहा वीर ही इस तरह की अपमान जनक शब्द सहन नहीं कर सकता है, निश्चित ही इस रंगमहल में वीर मौजूद हैं। गुरू विश्वामित्र के आदेश देने पर श्रीराम ने जैसे ही धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने लगे तभी धनुष टूट जाता है। धनुष टूटते ही जनकपुर नगरी के वासियों के रूप में रामलीला देखने आए रामलीला प्रेमियों के जयकारे से नगर गुंजायमान हो उठा
सीता राम एक दूसरे के गले में वरमाला डालते हैं।

धनुष टूटते ही परशुराम जी का दरबार में आगमन

एक ओर सीता स्वयंवर मेेंं भगवान शिव का धनुष भंग होता है तो दूसरी ओर तपस्या में बैठे भगवान परशुराम का तप धनुष टूटने के कारण भंग हो जाता है। क्रोधित होते हुए वे जनकपुर पहुंचते हैं। जहां रााजा जनक उनसे अपनी बेटी सीता का परिचय कराते हैं। सीता को देखकर उनका क्रोध कुछ शांत होता हैं। दूसरे ही क्षण धनुष भंग होने की याद आते ही वे फिर क्रोधित होकर धनुष भंग करने वाले को लेकर जनक से पूछताछ करते हैं।लक्ष्मण के आगे आने पर धनुष को लेकर दोनों के बीच तीखी नोकझोंक होती है। दोनों के बीच विवाद बढ़ता देख राम स्वयं आगे आते हैं और इस अपराध को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि “शिव धनुष को तोड़ने वाला शिव का ही कोई प्यारा होगा”
परशुराम अपने बल और क्रोध के वशीभूत होकर श्रीराम के विष्णु का अवतार होने की बात को भी नहीं समझ पाते हैं।
अंत में जब उन्हें श्रीराम के विष्णु अवतार होने की जानकारी लगती है तो वे भगवान विष्णु का प्रसिद्ध धनुष श्रीराम को सौंपते हैं और लक्ष्मण को जीवन के कुछ गूढ़ रहस्यों को समझाते हुए जनकपुर से वापस चले जाते हैं।
व्यासपीठ पर राकेश पाराशर अपनी मधुर वाणी से श्रीराम चरित मानस की चौपाइयों और दोहे का वाचन कर रहें हैं
इससे पहले लीला प्रारंभ में भगवान श्रीराम जी की आरती उतारी गई
अवसर पर रामलीला समिति अध्यक्ष जानकीवल्लभ पाठक शास्त्री, राकेश पाराशर,चंदन सिंह यादव, महेश चंद्र अग्रवाल, सुनील यादव, शंकर सिंह गुर्जर, संदीप उपाध्याय,केके पाराशर,मनोज गौड़, कैलाश खटीक, आशीष जैन, सोनू यादव, धर्मेंद्र यादव, उमेश लखेरा, सहित रामलीला आयोजन समिति के सभी पदाधिकारी उपस्थित थे

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