भारत का अतीत बहुत ही गरिमा और गौरवपूर्ण रहा है, उस अतीत को वर्तमान में प्रतिष्ठापित करें”-प्रमाण सागर महाराज

लोकमत सत्याग्रह/नीरज वैधराज /इंदौर

भारत का अतीत बहुत ही गरिमा और गौरवपूर्ण रहा है, उस अतीत को वर्तमान में प्रतिष्ठापित करें यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इंदौर के स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कही।

मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के “शताब्दी वर्ष” पूर्णता की बेला में स्वंयसेवकों के बीच “राष्ट्र और राष्ट्रीयता”विषय पर देश के गौरवपूर्ण अतीत को दौहराते हुये कहा कि हम सभी का एक ही लक्ष्य है”अपने अतीत को वर्तमान में प्रतिष्ठापित करें” उन्होंने राष्ट्रीय कवि मैथलीशरण गुप्त की ये पक्तियाँ “हम कौन थे, क्या हो गये, और क्या होंगेअभी, आओ सुझाए।बैठकर ये समस्यायें सभी” और उसका जबाब देते हुये कहते है कि “शानदार भूत था!भविष्य भी महान है यदि सुधारें आज, उसे जो वर्तमान है” आज “भारत विश्व के विकसित देशों में अपना स्थान बना रहा है, यह एक सुंदर पक्ष है।

लेकिन जब हम अंदर उतर कर देखते है,तो ऐसा लगता है बाहर से हम जितने शक्ति संपन्न हो रहे है भीतर से उतने ही शक्ती क्षींण होते जा रहे है” संत कहते है “भीतर से मजबूत मनुष्य बाहर से कमजोर होंने पर भी उपलब्धियां के शिखर तक पहुंच जाता है,लेकिन बाहर से शक्तिशाली और भीतर से कमजोर कभी टिक नहीं पाता है।

मुनि श्री ने कहा कि हमारी संस्कृति भीतर से मजबूत बनाने की संस्कृति रही है,तभी तो पूरे विश्व में वसुदेवकुटुम्बकम” का संदेश देने वाला भारत जंहा से जिओ और जीने दो का संदेश उदघोषित हुआ,और
सारे संसार को एक परिवार के रुप में देखने की भावना जगी, आज उसी भारत को जब हम देखते है तो हमें तकलीफ होती है जिस भारत से
विश्वबंधुत्व और वसुदेव कुटुम्बकम का संदेश गया उस भारत से आज कुटुम्ब ही समाप्त हो गये और परिवार विखर रहे है।

उन्होंने कहा कि श्रद्धा- सेवा- संवेदना-और समर्पण ये चार बाते हमारे जीवन में आ जाए तो व्यक्ति भी सुद्रढ़ बनेगा और राष्ट्र भी सुद्रढ़ बनेगा तथा सभी के मन में राष्ट्रीयता की भावना आएगी।

उन्होंने राष्ट्रीय भावना को जगाते हुये कहा कि सभी लोग अपने अपने परमात्मा और अपने अपने धर्म के प्रति श्रद्धा रखते है रखो और रखना भी चाहिये लेकिन जब कभी भी अपने राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात आए तो उसे सबसे ऊपर रखना चाहिये।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुये कहा कि आजकल राष्ट्रवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद हावी होता जा रहा है इससे राष्ट्र कमजोर होगा,राष्ट्रीय हितों के लिये व्यक्तिगत हितों को गोण करके चलना चाहिए। उन्होंने भामाशाह, सेठ टोडरमल तथा सेठ जगरुशाह का नाम लेते हुये कहा कि इन्होंने धन का विपुल संग्रह किया लेकिन जब राष्ट्र की बात आई तो अपने खजाने खोल दिये। यह उनकी उदारता तथा राष्ट्र प्रेम का घोतक थी।उन्होंने कहा कि भारत में अनेक धर्म है अनेक संप्रदाय है, सभी लोग अपने अपने धर्म और परंपराओं का पालन करे लेकिन सब धर्मों से ऊपर राष्ट्रीयता का धर्म होंना चाहिये तभी हम भारत के प्राचीन गौरव को लौटा सकते है।

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के विषय में कहा कि आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महाराज हमेशा कहा करते थे कि प्रत्येक भारतीय के अंदर भारत के प्रति निष्ठा ओर कर्तव्य की भावना जाग्रत होंना चाहिये,वह तभी होगी जब व्यक्ती व्यक्ती के अंदर प्रेम आत्मीयता और बंधुत्व जैसे उदात्त जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा हमारे अंदर होगी। उन्होंने कहा कि जबसे पश्चिमी जीवन मूल्य हमारे ऊपर हावी होंने लगे है हम अपने आदर्श वसुदेव कुटुम्बकम को भूलते जा रहे है इसीलिए हमारी भावनायें कुंठित होंने लगी है इसी कारण हमारा चित्त, चिंतन चरित्र,तीनों विक्रत हो रहे है हमें उनकी पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति श्रद्धा ही हमारे राष्ट्र की सुरक्षा है।

उन्होंने चिंता प्रकट करते हुये कहा कि हमारे देश में वसुदेव कुटुम्बकम की बात होती थी जिस देश में संतान अपने मां बाप की प्रण प्राण से सेवा करते थे आज उसी देश में मां बाप को वृद्धाश्रम का मुख देखना पड़ रहा है इससे बड़ी बिडम्बना और क्या होगी? जिस देश में एक संतान श्री राम जैसे हुये जिन्होंने अपने पिता के प्रण को सुरक्षित रखने के लिये वनवास को स्वीकार किया आज की कलयुगी संतान ऐसी है कि चंद संपत्ति के लिये अपने बाप को ही अदालत में घसीट कर ले जाती है,और उनसे उनकी संपत्ति छीन लेते है

उन्होंने एक उदाहरण देते हुये कहा कि पिता को जब वृद्धाश्रम में छोड़कर जाने लगा बेटा तो पिता ने उससे कहा कि यदि आज से पेंतीस वर्ष पहले में तुझे अनाथ आश्रम में छोड़ आया होता तो मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता।उन्होंने कहा कि हमने ऐसे लोगों को भी देखा है जो अपने बाप को वृद्धआश्रम में छोड आये और हर साल अपने जन्म दिन पर अनाथाश्रम को दान देते है उन्होंने कहा कि “जो लोग अपने वृद्ध मां बाप की सेवा नहीं कर सकते उनकी पारलौकिक सभी क्रियायें व्यर्थ है”

उन्होंने कहा कि बढ़ती हुई उपभोक्तावाद ने हमारी संवेदनाओं को समाप्त कर हमें निष्ठुर और कठोर बना दिया है, चित्त की अनुदारता और सोच की संकीणता तथा व्यवहार गत निष्ठुरता ने हमारे अंदर के मनुष्य को लील लिया है। उन्होंने कहा कि आज के मनुष्य की स्थिति तो यह हो गयी है जैसे माचिस की तीली “उपयोग करो और फैक दो” उन्होंने कहा कि पुत्र के होते हुये यदि पिता की प्रतिष्ठा धूमिल होती हो तो ऐसा पुत्र किस काम का?

“बाहर के रावण को जलाने से कुछ नहीं होगा अपने अंदर के राम को जगाने की चेष्टा करो” उन्होंने कहा कि जीवन के निर्माण में माता पिता का योगदान तो है ही समाज का भी बहुत बड़ा योगदान है, समाज सेवा के नाम पर दो केला और कम्बल बांटना नही होता। दूसरी ओर कुछ लोग समाज सेवा के नाम से सामाजिक समरसता को भड़काते है ऐसे लोग समाज के तथा समूची मानवता के वायरस है इनसे समाज को बचाना चाहिये।उन्होंने प्रकृति और पर्यावरण की बात करते हुये कहा कि आजकल जो मौसम में परिवर्तन हो रहा है उसका कारण भी मनुष्य ही है, यदि हर मनुष्य में मानवता आ जाए तो संसार की जो स्थिति है वह बदल जाए। उन्होंने कहा कि यदि अपसंस्कृति से बचना चाहते हो तो भारतीय संस्कृति तथा उसकी पवित्रता और सांस्कृतिक गौरव को लौटाना होगा भारतीय संस्कृति योग की संस्कृति है,उसे भोग की ओर न ले जाए आज हमने अपनी भाषा भूषा और संस्कृति को भुला दिया है तभी तो हालत यह है कि लोग ठठरी बांधना भी भूल गये है, हृदय में संवेदना जाग्रत तभी होगी जब हमारे हृदय में “जिओ ओर जीने दो” तथा सह अस्तित्व की भावना आएगी तभी हम सर्वभूतार्थ की भावना को जगा पाएगे

मुनि श्री ने मंगलभावना के साथ सभी स्वंयसेवकों को आशीर्वाद दिया।प्रवक्ता अविनाश जैन तथा मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने बताया कार्यक्रम की शुरुआत स्वंयसेवकों ने आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महाराज के चित्र अनावरण के साथ दीप प्रजवलन से किया इस अवसर पर डा. प्रकाश शास्त्री एवं डा. मुकेश मोड के साथ लगभग पांच हजार स्वंयसेवकों ने भाग लिया।इस अवसर पर धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी, नवीन आनंद गोधा, महामंत्री हर्ष जैन सहित सभी पदाधिकारियों ने स्वंयसेवकों का सम्मान किया।

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