उज्जैन में कालिदास समारोह का ऐतिहासिक महत्व

लोकमत सत्याग्रह /   उज्जैन में कालिदास समारोह की शुरुआत ऐसे कालखंड में हुई थी, जब मानसिक गुलामी का दौर था। विचारों की आजादी के लिए इन जंजीरों को तोड़ना जरूरी था। भारतीय विरासत को आगे बढ़ाने के लिए तब यह मुहिम उज्जैन में शुरू हुई।

पंडित सूर्यनारायण व्यास द्वारा स्थापित कालिदास समारोह की परंपरा अनवरत जारी है।

विस्तार

पंडित सूर्यनारायण व्यास, एक प्रतिष्ठित क्रांतिकारी और विद्वान, ने 1928 में उज्जैन में अखिल भारतीय कालिदास समारोह की शुरुआत की, ताकि भारत की मानसिक गुलामी को दूर किया जा सके और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित किया जा सके। जहां पुणे में लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव के माध्यम से हिंदुओं को जागरूक किया, वहीं व्यास जी ने उज्जैन में यह समारोह प्रारंभ किया। उन्होंने सिंहपुरी, महाराजवाड़ा, भारती भवन, और माधव कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित स्थलों पर कार्यक्रम आयोजित किए। पहले ही आयोजन में इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, जहां पोलैंड, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, सोवियत रूस, और चीन के नाट्य दलों ने कालिदास के नाटकों का मंचन किया। भारत से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर और पृथ्वीराज कपूर ने शास्त्रीय गायन व नाट्य मंचन द्वारा कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

1932-1935 के दौरान अपनी यूरोप यात्रा में व्यास जी ने कई प्रतिष्ठित विद्वानों से मुलाकात की, जिनमें स्टीफन ज्वेग और हिटलर शामिल थे। यूरोप में रहते हुए, जब उनसे पूछा गया कि भारत में कालिदास या विक्रमादित्य का कोई स्मारक है या नहीं, तो यह सवाल उनके हृदय में गहरे बैठ गया। स्वदेश लौटने के बाद, उन्होंने उज्जैन में विक्रम और कालिदास के भव्य स्मारक निर्माण का संकल्प लिया। इस उद्देश्य से उन्होंने विक्रम पत्रिका की शुरुआत की।

व्यास जी ने स्वतंत्रता संग्राम में भी योगदान दिया और 114 राजाओं को एकजुट कर विक्रम संवत के 2000 वर्ष पूर्ण होने पर विक्रम द्विसहस्राब्दी महोत्सव का आयोजन किया, जो उज्जैन से मुंबई तक मनाया गया। उन्होंने पृथ्वीराज कपूर के साथ “विक्रमादित्य” और भारतभूषण के साथ “कवि कालिदास” जैसी फिल्मों का निर्माण किया, जो पूरे भारत में सफल रहीं और जनमानस में विक्रम और कालिदास का नाम स्थापित करने में सहायक रहीं। उज्जैन में विक्रम कीर्ति मंदिर का निर्माण कर उन्होंने शहर को पहला सभागार प्रदान किया और कालिदास समारोह को आकाशवाणी और सोवियत रूस के टेलीविजन तक पहुंचाया।

1958 में, उन्हें भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पद्म भूषण से सम्मानित किया और व्यास जी से मिलने स्वयं भारती भवन आए। राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा का पद भी स्वीकारने को कहा, परंतु व्यास जी ने अनुरोध किया कि कालिदास समारोह को राष्ट्रीय समारोह के रूप में मान्यता दी जाए, जिससे यह हर प्रदेश में मनाया जा सके। इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने सभी राज्यों को कालिदास समारोह मनाने का निर्देश दिया।

पंडित सूर्यनारायण व्यास ने अपने जीवन को भारतीय संस्कृति और परंपरा के पुनर्जागरण के लिए समर्पित कर दिया। वे यह सिद्ध करने में सफल रहे कि जैसे पश्चिम में शेक्सपियर और सिकंदर का मान है, वैसे ही हमारे पास कालिदास और विक्रमादित्य का गौरव है।

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