लोकमत सत्याग्रह / भरत सिंह परमार : आज हम एक ऐसा दौर मैं हैं जहां पढ़ने की आदतों में लगातार गिरावट आ रही है। लोग केवल उन्हीं पुस्तकों को पढ़ने के इच्छुक हैं जो सीधे तौर पर उनकी शैक्षणिक गतिविधियों जैसे स्कूल कॉलेज के पाठ्यक्रम अथवा किसी परीक्षा से संबंधित होती हैं । यहाँ तक की एक सर्वे में यह आंकलन लगाया गया है कि मात्र 20% आबादी ही अपने शैक्षणिक पाठ्यक्रमों की पुस्तकों को पूरा पढ़ने की मेहनत करती है ज्यादातर छात्र छात्राएं न्युन्यतम आवश्यक से अधिक पढ़ने में रुचि ही रखते है।
कई लोग इस प्रवृत्ति के लिए सोशल मीडिया और स्मार्टफ़ोन जैसी चीज़ों को दोषी मानते हैं, फिर भी; सच तो यह है कि इसके लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पढ़ने की अनिच्छा के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं। कारण चाहे जो भी हों, सच तो यह है कि पढ़ने की अनिच्छा के कई नुकसान हैं।
। जब कोई खुद को केवल पास होने के लिए आवश्यक किताबों तक ही सीमित रखता है, तो वह जीवन के प्रति एक बेहद संकीर्ण दृष्टिकोण वाले व्यक्ति के रूप में विकसित होता है जिसको हर नयी जानकारी एक चुनौती के रूप में दिखाई देती है ।
। अधिकांश शैक्षणिक पुस्तकों में अपडेटेड जानकारी नहीं होती है। परिणामस्वरूप, जब किसी व्यक्ति का पढ़ना केवल इन पुस्तकों तक ही सीमित रहता है, तो उसके पास जो ज्ञान है वह पुराना हो सकता है।
किताबों से दूर रहने के कारण होने वाली ज्ञान की कमी व्यक्ति के आत्म-सम्मान को प्रभावित करती है। इससे व्यक्ति गंभीर विषय-वस्तु की चर्चा से बचता है और बौद्धिक स्तर पर पिछड़ जाता है ,और अपने से अच्छे बौद्धिक स्तर के व्यक्ति से असुरक्षा और द्वेष रखने लगता है ।
ऐसे लोगों के करियर का विकास थोड़ा भी काफी मुश्किल हो सकता है क्योंकि वे व्यापक पढ़ने के माध्यम से अपने ज्ञान का विस्तार करना रोक देते हैं।
सामाजिक बैठकों में , व्यक्ति तब अक्सर बगले झांकता हुआ पाया जाता है जब वह चल रही किसी विषय की बातचीत में योगदान ही नहीं दे पता । किताबें न पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए स्तरीय वार्तालापों में भाग लेना कठिन है।अक्सर वे इन वार्तालापों से कन्नी काटते हैं या वक्ता का उपहास उड़ाने का प्रयास करते हैं।
आजकल लोग पढ़ने की आदत की जगह स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं। स्मार्टफोन, लैपटॉप और टेलीविजन के सामने अत्यधिक समय व्यतीत होता है। इससे अनिद्रा और बार-बार होने वाले सिरदर्द जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। तो हम यह भी कह सकते हैं कि एक तरह से पर्याप्त किताबें न पढ़ने से लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।
इस सीमित अध्ययन के कारण ही लोगों की रचनात्मकता भी घटती जा रही है। और, यह रचनात्मकता ही है जो लंबे समय में किसी देश के विकास और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि किसी व्यक्ति को पढ़ने में कोई रुचि नहीं है, तो उनके संवाद कौशल और लेखन क्षमताएं भी विकसित नहीं हो सकती हैं। मुख्य बिंदुओं को दूसरों तक उपयुक्त और प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए विभिन्न विषयों पर पढ़ना अनिवार्य है।
अकादमिक के अलावा अन्य किताबें पढ़ने से आपको समस्याओं को समझने में मदद मिलती है और आपके तर्क कौशल में वृद्धि होती है। किताबें पढ़ने की आदत न होने से आपकी तर्क क्षमता कम हो जाती है।
पुस्तकें ज्ञान का व्यापक स्रोत हैं। किताबें पढ़ने का लाभ मिलने में कभी देर नहीं होती। एक तरफ, तनाव से राहत, से लेकर बेहतर याददाश्त तक, पढ़ना हमारे जीवन के सभी पहलुओं में बेहद फायदेमंद है। यह पाठक की गति से और पाठक के सुविधाजनक समय में ज्ञान को आत्मसात करने में मदद करता है।
जब आप देर रात टीवी देखते हैं तो दूसरों को परेशानी हो सकती है। परन्तु दूसरों को परेशान किए बिना देर रात तक पढ़ा जा सकता है।
सोशल मीडिया के विकास ने पढ़ने को एक चुनौती बना दिया है। लोग अधिक वीडियो देखने के तो आदी हो गए हैं पर ध्यान कम हो रहा है। वीडियो देख के हमको कुछ नया ज्ञान होने का भ्रम तो हो जाता है परन्तु अधिकांशतः वह मात्र सतही और अनुपयोगी ही होता है ।हालांकि आज जबकि ज्यादातर लोग मोबाइल रील ,और वीडियोस में समय बर्बाद कर रहे हैं उनकी तुलना में जो लोग नियमित रूप से पढ़ते हैं उन्हें इस दौर में पहले से कहीं अधिक लाभ होगा।


