लोकमत सत्याग्रह/देश के ग्रामीण इलाकों में, कई महिलाओं को अपने परिवार की खेती से सम्मानजनक आय अर्जित करने के अवसर नहीं मिलते, जबकि वे कृषि कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल होती हैं। देखा जाए तो वे भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की ‘अनसंग हीरो’ हैं, जो अपने परिवार की कृषि का बड़ा बोझ उठाती हैं, खासकर तब जब उनके पति आजीविका के लिए बड़े शहरों में जाते हैं। 8 मार्च को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर फार्म इक्विपमेंट सेक्टर, महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड एवं को-चेयर और फिक्की राष्ट्रीय कृषि समिति के प्रेसिडेंट हेमंत सिक्का ने यह बात कही है। उन्होंने देश में कृषि को सशक्त बनाने में महिलाओं की भूमिका को लेकर कहा, भारत में कार्यरत 80% महिलाएं खेती-किसानी में ‘अन्नदाता’ का सहयोग करती हैं। वे अपार प्रेरणा का स्रोत हैं, इसीलिए उन्हें ‘अनसंग हीरो’ कहा जाता है।
हेमंत सिक्का के मुताबिक, भारत का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, कृषि, पिछले दशक में उल्लेखनीय वृद्धि का साक्षी रहा है। देश की जीडीपी में लगभग 20% का योगदान करता है। यह क्षेत्र देश के 45% से अधिक कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी लगभग आधी है। भारत में कार्यरत 80% महिलाएं कृषि में संलग्न हैं। वे घर की आय बढ़ाने के अलावा घर-परिवार की देखभाल और अन्य घरेलू जिम्मेदारियां भी निभाती हैं। इसके बावजूद, लिंग आधारित पूर्वाग्रह, सामाजिक प्रतिबंध और पारंपरिक भूमिका की अपेक्षाएं महिलाओं के लिए कृषि ज्ञान और तकनीक तक पहुंच को सीमित करती हैं, जिससे उनकी उत्पादकता कम होती है।
पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2023-24 के अनुसार, 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता दर 70.4% है, जबकि ग्रामीण पुरुषों की साक्षरता दर 84.7% और शहरी महिलाओं की साक्षरता दर 84.9% है। मई 2020 की ‘एग्रीकल्चरल वेजेज इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, यह भी चिंताजनक है कि खेती में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद, पुरुषों और महिलाओं के बीच मजदूरी का अंतर बराबर नहीं है। इन चुनौतियों के बावजूद, महिला किसान अपार प्रेरणा का स्रोत हैं क्योंकि वे अपनी भावना में चिंगारी के साथ राष्ट्र की सेवा करती हैं।
महिलाओं को कृषि में प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक नीतियां …
इन चुनौतियों के बावजूद, महिला किसान देश के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। ऐसे में, कृषि में महिलाओं को सशक्त करने के लिए नीतिगत सुधार क्या हो सकते हैं? सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र को समर्थन देने और आधुनिक तकनीकों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, महिला-कृषि सशक्तिकरण को और गति देने के लिए कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं?
महिला स्वयं सहायता समूहों को किसान उत्पादक संगठनों में बदलना
‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना को महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सशक्त किया जा सकता है। स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ शिक्षा, पोषण और परिवार नियोजन जैसे क्षेत्रों में उनके परिवारों की मदद भी कर सकते हैं।
‘लखपति दीदी‘ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम
सरकार की ‘सबका साथ’ पहल सराहनीय है। दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अनुसार, दिसंबर 2023 तक भारत में 90 लाख स्वयं सहायता समूह हैं, जिनकी सदस्य संख्या लगभग 10 करोड़ महिलाएं है। इन स्वयं सहायता समूहों को महिला-नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठनों में परिवर्तित करना, ग्रामीण महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। ये किसान उत्पादक संगठन फसल चयन, माइक्रोफाइनेंस तक पहुंच और प्रभावी मार्केटिंग में मदद कर सकते हैं, जिससे महिलाएं छोटे कृषि-आधारित व्यवसायों और पैकेज्ड फूड उद्योगों में कदम रख सकती हैं।
कृषि उपकरणों तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाना
अधिक महिलाएं कृषि उपकरणों का संचालन करने में रुचि ले रही हैं। सरकार की (सबमिशन ऑन एग्रीकल्चर मैकेनाइजेशन) योजना इसी दिशा में एक सकारात्मक पहल है। केंद्र सरकार की इस योजना के तहत किसानों को कृषि मशीनरी खरीदने के लिए 50-80% तक की सब्सिडी का लाभ दिया जाता है, जिसमें महिला किसानों को प्राथमिकता दी जाती है। सभी राज्यों में कार्यान्वयन के साथ, सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह कृषि उपकरण को प्राप्त करने के लिए किफायती वित्त तक अधिक पहुंच सुनिश्चित करे। साथ ही कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए जाने चाहिए, जिससे महिलाएं उपकरणों का उपयोग कर सकें।
कृषि मशीनीकरण पर भी ध्यान देने की जरुरत
भारत को ट्रैक्टरों से परे कृषि मशीनीकरण पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि फसल के जीवन चक्र में विभिन्न प्रकार की फसलों की पूर्ति के लिए किफायती समाधान मिल सके। धान रोपाई तकनीक जैसी सुविधाओं का व्यापक प्रसार किया जाना चाहिए, ताकि ओडिशा, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे धान उत्पादक राज्यों में महिलाओं को पीठ-तोड़ने वाले मैन्युअल ट्रांसप्लांटेशन से राहत मिल सके।
महिलाओं द्वारा समाधान विकसित करना
कृषि अनुसंधान और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके 113 संस्थान और 74 कृषि विश्वविद्यालय नई तकनीकों को अपनाने, ग्रामीण नवाचार को बढ़ावा देने, और जलवायु-संबंधी अनुकूलनशील कृषि को विकसित करने में योगदान देते हैं।
महिला–केंद्रित कृषि समाधान विकसित करने चाहिए
हालांकि, महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को महिला-केंद्रित कृषि समाधान विकसित करने चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और मोबाइल एप्लिकेशन जैसी नई तकनीकों के समावेश से महिला किसानों के लिए बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
‘विकसित भारत‘ का सपना साकार
निजी क्षेत्र भी महिला किसानों के लिए सस्ती और सुलभ कृषि तकनीकों के विकास में योगदान दे सकता है। ग्रामीण महिलाओं को इनोवेशन और टेक्नोलॉजी से जोड़कर, उन्हें कृषि में सशक्त बनाया जा सकता है, जिससे वे प्रधानमंत्री के ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने में योगदान दे सकें। हेमंत सिक्का के अनुसार, भारत को कृषि और खासकर ग्रामीण भारत में लैंगिक मुद्दों के इर्द-गिर्द मुख्य दक्षताओं को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिसमें नीति और शोध में महिलाओं के दृष्टिकोण को एक एकीकृत घटक के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। खेती में महिलाओं की प्रगति और विकास को देश के समग्र विकास लक्ष्यों से निकटता से जोड़ा जाना चाहिए, साथ ही भारत की प्रतिष्ठा को भी बढ़ाना चाहिए, क्योंकि यह दुनिया का अन्नदाता बन गया है।


