MP Samwad 2025: ‘पांच लाख वृक्ष लगाने के बाद ही करूंगी रामलला के दर्शन’; ‘संवाद’ के मंच से बोलीं शिप्रा पाठक

लोकमतसत्याग्रह/विकास, अर्थव्यवस्था, सिनेमा, खेल और अध्यात्म जैसे जरूरी मुद्दों पर चर्चा के लिए मशहूर ‘संवाद’ कार्यक्रम चल रहा है। इस कार्यक्रम में वॉटर वुमन शिप्रा पाठक ने ‘जल है तो कल है’ विषय पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में वॉटर वुमन शिप्रा पाठक ने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा, “बच्चे के जन्म के 3 से 5 दिन बाद उसका नाम रखा जाता है। मेरा नाम ‘शिप्रा’ रखा गया, जिसका मतलब है कि प्रकृति ने मुझे एक उद्देश्य के साथ भेजा था।”

उन्होंने बताया, “मैंने 13 से 15 देशों में काम किया और कई स्कूलों की स्थापना की। इसके बाद जल के प्रति मेरी संवेदना लगातार बढ़ती गई। मां नर्मदा की 3600 किलोमीटर की यात्रा और मानसरोवर की यात्रा ने मेरी सोच को बदल दिया। मुझे लगा कि जिंदगी बहुत छोटी है, सिर्फ अपना बिज़नेस बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ करना। इसलिए मैंने जल संरक्षण के लिए काम करना शुरू किया।”

‘जब तक 5 लाख पेड़ नहीं लगाऊंगी, तब तक राम लला के दर्शन नहीं करूंगी’

‘संवाद’ कार्यक्रम में वॉटर वुमन के नाम से प्रसिद्ध शिप्रा पाठक ने अपनी प्रेरणादायक यात्रा और प्रण के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अयोध्या से रामेश्वरम तक 4000 किलोमीटर लंबी पदयात्रा की है। इस यात्रा का उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल और वायु का अधिकार दिलाना भी है।

शिप्रा पाठक ने बताया कि उन्होंने प्रण लिया है कि जब तक वे अयोध्या के आसपास 5 लाख पेड़ नहीं लगा देतीं, तब तक राम लला के दर्शन नहीं करेंगी। इस पर उन्होंने भावुक होकर कहा, “जब हम कहते हैं कि राम लला की प्राण प्रतिष्ठा की गई है, तो इसका मतलब है कि उनमें अब प्राण हैं। ऐसे में हम उन्हें गंदा सरयू जल कैसे अर्पित कर सकते हैं? क्या उनके फेफड़ों को दूषित हवा से कोई नुकसान नहीं होगा?”

उन्होंने आगे कहा, “अगर हमने राम लला का मानवीकरण किया है, तो फिर हमें उनकी सांसों की भी चिंता करनी चाहिए। सिर्फ प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें फिर से पत्थर मान लेना और घर चले जाना यह गलत है।” शिप्रा पाठक ने बताया कि अब तक वे 3 लाख पेड़ अयोध्या के 50 किलोमीटर दायरे में लगा चुकी हैं और शेष 2 लाख पेड़ जल्द ही लगाए जाएँगे। उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूं कि जब राम लला शाम को विहार के लिए निकलें तो उन्हें शुद्ध वायु मिले। यही मेरा संकल्प है और जब तक ये पूरा नहीं होगा, मैं दर्शन नहीं करूंगी।”

‘मैं भी सिर्फ अपना काम कर रही हूं जैसे गिलहरी ने किया था’

आज के दौर में तेजी से हो रहे औद्योगिक विकास की वजह से पेड़ों की कटाई बढ़ रही है, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। ऐसे में अपने प्रयासों को लेकर शिप्रा पाठक ने भगवान राम के जीवन से प्रेरणा का ज़िक्र करते हुए कहा, “जब राम सेतु बन रहा था, तब गिलहरी यह नहीं सोच रही थी कि कौन कितना बड़ा पत्थर फेंक रहा है। वह बस अपना छोटा-सा योगदान दे रही थी। राम की दृष्टि इतनी गहरी थी कि उन्होंने उस गिलहरी के योगदान को भी सम्मान दिया। यही विशेषता उन्हें ‘राम’ बनाती है।”

उन्होंने कहा, “मैं भी उसी भावना से काम कर रही हूं। अगर मैं भी सोचने लगूं कि मेरा योगदान छोटा है या कोई और क्या कर रहा है, तो मैं भी उसी कतार में खड़ी हो जाऊंगी, जहां सिर्फ धरने के नाम पर महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं।” शिप्रा पाठक ने आज की युवा पीढ़ी, खासकर बेटियों को संबोधित करते हुए कहा, “आज की बेटियां यह भूल रही हैं कि भारत धरने से नहीं, धारणा से बदलेगा। सिर्फ विरोध या प्रदर्शन से कुछ नहीं होगा, जब तक सोच और संकल्प में बदलाव नहीं आता।”

‘भारत में आधुनिकता नया नहीं, हमारी परंपरा का हिस्सा है’

शिप्रा पाठक ने आधुनिकता, भारतीय संस्कृति और नारी सशक्तिकरण पर अपने विचार रखते हुए कहा कि जिसे आज हम आधुनिक सोच कह रहे हैं, वह भारत में पहले से ही मौजूद रही है। उन्होंने कहा, “हम जब आधुनिकता की बात करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि हमारे देश में ये सारी बातें पहले से हो चुकी हैं, लेकिन मर्यादा में रहकर।”

शिप्रा पाठक ने सिंगल पेरेंटिंग का उदाहरण देते हुए कहा, “आज हम इसे आधुनिक विचार मानते हैं, लेकिन मां सीता ने यह काम बहुत पहले ही किया था। उन्होंने जंगल में अपने दोनों बेटों की परवरिश की, लेकिन न कभी पति की, न ससुराल की आलोचना की। अगर वह ऐसा करतीं तो सिर्फ ‘सीता’ रह जातीं, लेकिन उन्होंने अपने आचरण से ‘मां सीता’ का दर्जा पाया।”

उन्होंने भारतीय ज्ञान और विज्ञान की चर्चा करते हुए कहा कि भारत विषय गुरु इसलिए नहीं था कि हमारे पास संसाधन थे, बल्कि इसलिए कि हमने चरित्र, मर्यादा और व्यवहार को विज्ञान के साथ जोड़ा था। “हमने शल्य चिकित्सा से लेकर आयुर्वेद तक की खोज की थी। हमें मेकअप और श्रृंगार के बीच का अंतर समझना होगा,” उन्होंने कहा।

शिप्रा पाठक ने कहा कि अगर हमें अपनी संस्कृति को बचाना है, तो हमें अपनी बेटियों को सिर्फ आधुनिकता नहीं, बल्कि मां अहिल्या बाई, महारानी दुर्गावती, और सावित्री बाई फुले जैसे महान महिलाओं के विचार देने होंगे। “जब तक हम अपनी बेटियों को इन आदर्शों से नहीं जोड़ेंगे, तब तक हम अपनी जड़ों को मजबूत नहीं कर पाएंगे।”

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