लोकमतसत्याग्रह/भारतीय ज्ञान परंपरा सिखाती है कि वास्तविक स्वतंत्रता आत्म-ज्ञान से आती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल नारा नहीं बल्कि जीवन जीने की नीति है। यह दृष्टि हमारे सांस्कृतिक ताने-बाने को सुदृढ़ करती है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को नैतिक नेतृत्व प्रदान करती है।
स्वतंत्रता, हमारे राष्ट्र के इतिहास का सर्वाधिक पवित्र और प्रिय शब्द है। किंतु भारतीय सभ्यता के विराट परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ केवल राजनीतिक मुक्ति भर नहीं रहा, यह उससे कहीं अधिक गहन, व्यापक और शाश्वत है। हमारे ऋषि-मुनियों, योगियों और संतों ने इसे “मुक्ति” कहा। ऐसी अवस्था जिसमें मन, इन्द्रियों और अहंकार के सभी बंधन समाप्त हो जाएं और मनुष्य अपने शुद्ध, असीम, अनादि-अनंत स्वरूप का साक्षात्कार कर ले। यही अनुभूति उपनिषदों के मंत्रों में गूँजती है, महाभारत के कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण के उपदेश में प्रवाहित होती है, और जिसे महात्मा गांधी ने “स्वराज” कहा, पहले आत्म-शासन, फिर राष्ट्र-शासन। क्योंकि जो स्वयं पर विजय नहीं पा सकता, वह किसी भी बाहरी स्वतंत्रता को स्थिर और सार्थक रूप से धारण नहीं कर सकता।
2047 का भारत: केवल बाहरी स्वतंत्रता या आंतरिक मुक्ति भी?
आज, जब हम 2047 के विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक है। क्या हम केवल बाहरी स्वतंत्रता को पर्याप्त मान लेंगे या उस आंतरिक स्वतंत्रता को भी गढ़ेंगे जो किसी भी राष्ट्र को स्थायी, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से महान बनाती है? गीता का संदेश “योगस्थः कुरु कर्माणि” हमें यह सिखाता है कि सच्ची आज़ादी तब है जब हम अपने कर्तव्य में अडिग रहें, लेकिन परिणाम के मोह से मुक्त हों। “समत्वं योग उच्यते” सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में अचल संतुलन बनाए रखना, यही वह मानसिक और आध्यात्मिक अवस्था है जो व्यक्तिगत से लेकर राष्ट्रीय जीवन तक विकास का आधार है।
उपलब्धियां और चुनौतियां
पिछले दस वर्षों में भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अवसंरचना और वैश्विक कूटनीति में उल्लेखनीय प्रगति की है। जुलाई 2025 तक भारत की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 242.78 गीगावाट हो गई, वह भी लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले। डिजिटल इंडिया ने इंटरनेट की पहुँच गांव-गांव तक बढ़ा दी है। भारत के पास 1.8 लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप हैं, जो इसे विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हम भीतर से भय, लोभ और संकीर्णता से मुक्त हो रहे हैं? यदि मानसिक स्वतंत्रता नहीं है, तो बाहरी उपलब्धियाँ रेत के महल की तरह क्षणभंगुर सिद्ध होंगी।
भारतीय ज्ञान परंपरा और स्वतंत्रता
भारतीय ज्ञान परंपरा सिखाती है कि वास्तविक स्वतंत्रता आत्म-ज्ञान से आती है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल नारा नहीं बल्कि जीवन जीने की नीति है। यह दृष्टि हमारे सांस्कृतिक ताने-बाने को सुदृढ़ करती है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को नैतिक नेतृत्व प्रदान करती है। विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक निवेश से नहीं, बल्कि नैतिक निवेश, मूल्य-आधारित शिक्षा और चरित्र-निर्माण से होगा। शिक्षा तभी सार्थक है जब वह विद्यार्थियों को केवल नौकरी चाहने वाला नहीं बल्कि समाधान निर्माता बनाए।
युवा: परिवर्तन के वाहक
15 से 24 वर्ष आयु के 23 करोड़ युवा भारत की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यदि वे केवल उपभोक्ता बनकर रह जाएँ, तो यह जनसंख्या भार में बदल सकती है; किंतु यदि वे ज्ञान, कौशल और नैतिक दृष्टि से सम्पन्न हों, तो यह शक्ति भारत को आध्यात्मिक और आर्थिक महाशक्ति बना सकती है। स्वामी विवेकानंद का आह्वान “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” केवल व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति का आधार होना चाहिए।
राजनीति में आध्यात्मिक स्वतंत्रता
राजनीति में आध्यात्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है। शासन में पारदर्शिता, मतभेदों में संवाद और निर्णयों में नैतिकता। लोकतंत्र तभी जीवंत है जब असहमति को देशद्रोह नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का अवसर माना जाए। पंचायत से संसद तक युवाओं को निर्णायक भूमिकाएँ, नीतियों में जन-भागीदारी और शासन का उद्देश्य नागरिकों के आंतरिक और बाहरी जीवन का उत्थान होना चाहिए। तभी हम गांधी के सत्याग्रह और स्वराज के आदर्शों के निकट पहुँचेंगे।
पर्यावरण और स्थायी स्वतंत्रता
पर्यावरण के संदर्भ में स्वतंत्रता का अर्थ है विकास को प्रकृति के विरोध में नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य में आगे बढ़ाना। जब गांव-गांव के युवा सौर ऊर्जा प्रणालियां स्थापित करेंगे, विश्वविद्यालय हरित ऊर्जा में आत्मनिर्भर होंगे और कृषि बायोगैस व स्मार्ट तकनीक पर आधारित होगी, तभी हम आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, जल और भूमि की स्वतंत्रता दे पाएँगे।हमारे वेदों का दृष्टिकोण ‘पृथ्वी: मातारम्’ धरती को माँ मानना, उपभोग की वस्तु नहीं यही मार्गदर्शन देता है।
सबसे गहरी स्वतंत्रता मानसिकता में निहित है। जब हम विफलता को सीखने का अवसर, असहमति को लोकतंत्र की शक्ति और विविधता को राष्ट्र की ऊर्जा मानने लगते हैं, तभी हम भीतर से मुक्त होते हैं। भय को जिज्ञासा में और संदेह को सहयोग में बदलना यही स्थायी स्वतंत्रता है। आत्मनिर्भर और विकसित भारत का स्वप्न वही स्वर है जो प्राचीन ऋचाओं से लेकर आधुनिक नवाचार प्रयोगशालाओं तक गूँजता है। यदि हम आज, 2025 से इस आंतरिक और बाहरी स्वतंत्रता को साथ लेकर चलें, तो 2047 का भारत केवल आर्थिक रूप से विकसित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी विश्व का मार्गदर्शक होगा एक ऐसा भारत जो अपनी जड़ों में दृढ़, पंखों में असीम विस्तार और दृष्टि में पूरी मानवता को समेटे होगा।


