101वें तानसेन समारोह का भव्य आगाज, शहनाई और कव्वाली के सुरों से गूंजा हजीरा परिसर

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रतिष्ठित तानसेन समारोह का आज पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हुआ। हजीरा स्थित तानसेन समाधि स्थल पर छिड़े सुरों ने सुबह का माहौल भक्ति और संगीत रस से भर दिया।

देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित भारतीय शास्त्रीय संगीत महोत्सव ‘तानसेन समारोह’ का सोमवार सुबह पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुभारंभ हुआ। ग्वालियर के हजीरा स्थित तानसेन समाधि स्थल पर शहनाई वादन, हरिकथा, मिलाद, चादरपोशी और कव्वाली गायन के साथ इस वर्ष समारोह के 101वें संस्करण की शुरुआत हुई।

इस अवसर पर उस्ताद मजीद खान एवं साथियों ने रागमय शहनाई वादन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके बाद ढोलीबुआ महाराज नाथपंथी संत श्री सच्चिदानंद नाथ जी ने संगीतमय आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए कहा कि हर मनुष्य में ईश्वर विद्यमान है और सुर ही सच्चा धर्म है। जो निर्विकार भाव से गाता है वही सच्चा भक्त है। उन्होंने राग वृंदावनी सारंग में मेरा साहिब को दिल अटका और रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम जैसे भजनों का गायन किया।

इसके बाद मुस्लिम समुदाय की ओर से मौलाना इक़बाल हुसैन क़ादिरी ने इस्लामी परंपरा के अनुसार मिलाद शरीफ की तकरीर पेश की। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी भक्ति मोहब्बत है और तू ही जलवानुमा है मैं नहीं हूं… जैसे कलाम पेश किए।

कार्यक्रम के अंत में हजरत मोहम्मद गौस और तानसेन की मजार पर राज्य सरकार की ओर से पारंपरिक चादरपोशी की गई। इस दौरान जनाब भोलू झनकार, अख्तर भाई, सोहेल खान और आरिफ मोहम्मद ने खास दरबार-ए-मोहम्मद से ये आई चादर, छाप तिलक सब छीनी रे और कृपा करो महाराज जैसी प्रसिद्ध कव्वालियां प्रस्तुत कीं।

शाम को हजीरा स्थित तानसेन समाधि परिसर में ऐतिहासिक चतुर्भुज मंदिर थीम पर बने भव्य मंच पर औपचारिक शुभारंभ होगा, जहां देश-विदेश के प्रसिद्ध कलाकार संगीत सम्राट तानसेन को स्वरांजलि अर्पित करेंगे।

इस मौके पर संस्कृति विभाग के संचालक एन. पी. नामदेव, उस्ताद अलाउद्दीन खां कला एवं संगीत अकादमी के निदेशक प्रकाश सिंह ठाकुर, ध्रुपद गुरु अभिजीत सुखदाने, अन्य कलाकार, अधिकारी, गणमान्य नागरिक और मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

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